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संभावनाओं का सागर

28 Jul 2019

गिरते समय हमारे हाथ क्यों फैल जाते हैं और हमें सपने कैसे दिख जाते हैं आँखें बंद होते हुए भी ?

     क्या आप जानते हैं कि हमारी धड़कन, हमारी सांसें को कौन चलाता है ? हमें सपने आँखों के बंद होने के बावजूद भी कैसे दिख जाते हैं, यही नहीं हम सही गलत जो भी करते हैं इसके पीछे क्या राज है इन सभी के बारे विस्तार से जानेंगे।

इस आर्टिकल में हम ऐसी बातें जानेंगे जो हमारे जीवन जीने के तौर-तरीकों को ही नहीं बल्कि हमें अपनी असली स्वतंत्रता से जीने की सही मामले में आजादी मिल जायेगी। इसलिए इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़िएगा और अपने किमती राय भी दिजिए।


सबसे पहले इस सवाल को जानते हैं कि कैसे हमारे हाथ शरीर के गिरते समय अपने - आप फैल जाते हैं।




 हमारे दैनिक जीवन में अनेक ऐसी क्रियाएँ अथवा घटनाएँ हैं जिनके बारे में हम कहीं न कहीं पूरी तरह से नहीं जानते हैं। उन्हीं में से एक यह है कि जब हम गिरने वाले होते हैं तो हमारे हाथ फैल जाते हैं।ऐसा क्यों होता है यह सवाल अगर अपने आप से पूछो तो ज्यादातर लोगों को इसका ठीक - ठीक उत्तर नहीं मिल पाता है। चलिए अपने शरीर के गुण के बारे में जानते हैं।










 गिरते समय हमारे हाथ क्यों फैल जाते हैं ?

       हमारे हाथ का फैलना ( गिरते समय ) हमारे शरीर के एक विशेष गुण का होना है। दरअसल हमारे शरीर में मुख्यरुप से दो दिमाग / मस्तिष्क माने जाते हैं  - 
  1. दिल / मन ( अचेत मन या अवचेतन मन ) 
  2. दिमाग / मस्तिष्क ( चेतन या सचेत मन ) 


      इसमें दिल / मन, दिमाग से अत्यंत तेज होता है ( गति में )। इसके लिए बहुत सी क्रियाएँ 1 सेकेंड से भी कम समय में पुरी ही नहींं होती बल्कि काफी भी होती है। दरअसल हमारा मन यह कभी भी नहीं चाहता है कि हम किसी तरह की तकलीफ सहें क्योंकि इसे वह अहसास पता है जो इसे अच्छे नहीं लगते हैं। यह हमेशा अच्छा अहसास कि इच्छा रखता है और यह इसी अच्छे अहसास को पाने के लिए हमेशा काम करता रहता है।


 इसलिए जब हमारा शरीर अचानक में गिरनेे वाला होता है तो हमारा यह मन वह पोजीशन प्रदान करता है जिससे हमारे शरीर को कोई हानि ना पहुुंचे। यही कारण है कि हमारे हाथ शरीर के गिरने से पहले ही फैल जाते हैं।
         क्या हम ऐसे समय में यह सोच सकते हैं कि हमें क्या करना है और क्या नहीं। दरअसल हमारे दिमाग को किसी भी वस्तु या क्रिया को समझने में कम से कम 1 सेकेंड तो लगेगा पर तबतक तो हम धरती पर गिर चुके होगेें। 

   चलिए अब जानते हैं वैज्ञानिक दृष्टि से कि अचानक गिरते समय हमारे हाथ फैलने के क्या होता है।  
दरअसल जब हमारा शरीर अचानक गिरता है तो इसकी गति एकाएक तेजी से बढ़ने लगती है जिसके विरोध में हमारा हाथ फैल जाता है और गिरने की गति थोड़ी सी कम हो जाती है अथवा यह शरीर की सबसे संतुलित स्थिति होती है उस समय। 
       उपर्युक्त बातें यह भी स्पष्ट करती हैं कि मन को अचेत या अवचेतन मन कहना तर्कसंगत नहीं होगा क्योंकि यह तो हमेशा सक्रिय ( active ) रहता है और तभी तो इसे हर छोटी - बड़ी क्रियाओं का ज्ञान  पहले ही हो जाता है। भले ही यह तर्क नहीं करता, पर हमेेशा जागृत रहता है और जागृत रहना भी सचेत होने की पुष्टि करता है।









मन ( Unconscious mind ) की विशेषताएँ 

मन की विशेषताएँ इस प्रकार हैं - 
  • मन ना तो सोचता है और ना ही समझता है। 
  • मन अहसास, महसूस अथवा भावनाओं के आधार पर चलता है। 
  • इसकी गति प्रकाश की गति से भी तेज होता है। 
  • इसमें अलौकिक शक्तियों को पढ़ने की क्षमता होती है। 
  • मन या अवचेतन मन से ही हमारे शरीर की क्रियाओं का सम्पादन होता है। 
  • हमारे शरीर में जैसा अहसास होगा वैसी ही ऊर्जा हमारे अन्दर होगी। 
  • मन की मदत से आदमी भगवान के तुल्य हो सकता है। 
  • पूजा - पाठ भी मन से सफल होती है, मस्तिष्क से नहीं। 





 मन की विशेषता और कमियों का स्पष्टीकरण 📣


    मन की विशेषताएँ इतनी है कि इसके लिए एक किताब भी कम पड़ जायेगी। मन की विशेषताओं के अलावा कुछ कमियां हैं जो मुश्किलें पैदा करती हैं। चुँकि हमने ऊपर पढ़ा है कि मन कुछ सोचता नहीं है कि क्या गलत है और क्या सही है। इसे अगर गलत काम भी अच्छा लगे तो वह उसी को करना चाहेगा बिल्कुल बच्चे की तरह जिन्हें गलत - सही का कोई पर्क नहीं होता। और दिमाग / मस्तिष्क बच्चों के अभिभावकों का काम करता है जो मन को गलत - सही का फर्क बताता है। हमारा मस्तिष्क हमारे मन को जब उसकी खामियों के  ( जो वह करना चाहता है ) बारे में बताता है और यह अहसास दिलाता है कि इससे तुम्हें बुरा अहसास मिलेगा और अगर तुम्हें सही में अच्छा अहसास पाना है तो यह करो। जो दिलाशा हम मन को देते हैं वह उससे भी अधिक अच्छा लगना चाहिए जो पहले वह करना चाहता था। ऐसा होने पर मन - मस्तिष्क के साथ हो लेता है जिसे साधरण भाषा में बात मानना कहते हैं । यह वही स्थिति है जब हमे कोई मतभेद नहीं होता है और तभी तो हमारे सर में कोई तनाव नहीं होता है। हमारे सर में तनाव ज्यादा तब होता है जब मन और मस्तिष्क के मतो में अन्तर होता है यानी मन कुछ और मस्तिष्क कुछ कहता है। कभी-कभी हमें बहुत सी बातें बिना सोचे समझे मिल जाती हैंं पर हम जबतक वैज्ञानिक आधार पर नहीं समझ पाते हैं तबतक हम उसे जानते हुए भी विश्वास नहीं करते / कर पाते।









हमें स्वप्न / सपने कैसे दिखते हैं जबकि हमारी आँखें बंद होती हैं। 


   बहुत से लोग यह सोचते होगें कि बिना आँखों को खोले कुछ देखा नहीं जा सकता है पर सपने हमें कैसे दिख जाते हैं जबकि हमारी आँखें तो बंद रहती हैं। इसको जानने और समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि सपने किन  - किन कारणों से दिखते हैं। यह मुख्यतः दो कारणों से दिखते हैं -

  1. सोंच के कारण सपने दिखना। 
  2. बिना सोचे सपने दिखाई देना। 




स्पष्टीकरण :  सबसे पहले यह जान लेते हैं कि हमें कोई भी वस्तु कैसे दिखाई देती है। जब हम किसी भी वस्तु को देखते हैं तो उस वस्तु का प्रतिबिम्ब हमारे रेटिना के फोकस पर बनता है। इस तरह हमेें वह वस्तु दिखाई देने लगती है। इसी तरह से जब हम किसी व्यक्ति या वस्तु की कल्पना गहराई से करते हैं तो उस व्यक्ति या वस्तु का प्रतिबिम्ब हमाारी रेटिना पर पर बनने लगता है और सपने में भी यह दिखाई दे सकता है । जैसे हमें यह अहसास होता है कि हमें वह वस्तु वास्तव में दिखाई दे रही हो। पर यह तभी possible है जब हम उस व्यक्ति या वस्तु को पहले से ही देखा हो।
    अब बात करते हैं कि वह व्यक्ति या वस्तु हमें सपनों में कैसे दिखाई देता है जिसके बारे में हमने ना कभी सोचा और ना ही कभी भी देखा हो। इस तरह के सपने दैवीय हो सकते हैं। हम जानते हैं कि जिस तरह से कोई फोटो, विडियो आदि चिजे एक मोबाईल से दूसरे मोबाईल तक ऊर्जा के रूप में स्थानांतरित होते ( आते - जाते ) हैं। बिल्कुल इसी तरह से हमारी आत्मा से शरीर तक सभी दृश्य ऊर्जा के रुप में आते हैं।  ऐसा तब होता है जब शरीर के आसपास ऐसी ऊर्जाओं का आना - जाना होता है। यह ऊर्जा हमारे शरीर से कभी-कभी अपने आप कनेक्ट हो जाती है और कभी-कभी कनेक्ट कराई जाती है। जो दैवीय शक्तियों द्वारा भी हो सकती है। यह पुरी तरह से कहना वैज्ञानिकों के लिए भी मुमकिन नहीं है क्योंकि यह वैज्ञानिक दृष्टि से सिध्द नहीं हुआ है।





आपकी क्या राय है जरूर बताएँ हमें बहुत खुशी होगी। धन्यवाद...



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