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पृथ्वी पर पानी है पर चन्द्रमा पर नहीं ऐसा क्यों ?



पृथ्वी और चंद्रमा दोनों पर पानी के होने या ना होने की वजह है इनका वातावरण
 अब ये वातावरण  क्या है इसको जाने बिना हमारी जानकारी अधुरी है। 






पृथ्वी के चारो ओर वातावरण है पर चन्द्रमा पर बहुत कम है इसकी जानकारी दी गई है।



वातावरण (atmosphere,environment) 


    वातावरण का शाब्दिक अर्थ जानने के लिए हमें इसका संधि विक्षेद करना होगा।
संधि विक्षेद
वातावरण = वात + आवरण

वात का मतलब हवा  ( हवा = वात, वायु, बयार, पवन आदि ) होता है। इसके बाद आवरण का मतलब परत, कवर आदि होता है। इन दोनों शब्दों को एक साथ मिलाकर अर्थ निकाले तो इसकी परिभाषा इस प्रकार होगी -
वातावरण : हमाारे चारों तरफ जो हवा का आवरण है इसे ही वातावरण कहते हैं।
  अब सवाल यह है कि यह वातावरण किस बात पर निर्भर करता है, कैसे बनता है और क्यों ?


वातावरण उत्पन्न होने के कारण

वातावरण को उत्पन्न करने वाला कारण है गुरुत्वीय त्वरण (gravitational acceleration)
    जिस ग्रह का गुरुत्वीय त्वरण जितना अधिक होगा उस ग्रह पर उतना ही ज्यादा वातावरण होगा। हम जानते हैं कि पृथ्वी का गुरुत्वीय त्वरण चन्द्रमा से अधिक है। यही कारण है कि चन्द्रमा पर वातावरण बहुत कम है। अब आती है उस सवाल की जो सारे सवालों का जवाब देगा। क्या गुरुत्वीय त्वरण भी किसी कारण पर निर्भर है या इसकी उत्पत्ति का कारण क्या है ? 


गुरुत्वीय त्वरण उत्पत्ति का कारण

  पृथ्वी हो या कोई भी ग्रह सभी के गुरुत्वीय त्वरण उसकी अपनी अक्ष पर घूमने के वेग पर निर्भर करता है। जो ग्रह अपनी अक्ष पर जितना तेजी से घूर्णन (घूमना ) गति करेगा उसका गुरुत्वीय त्वरण उतना ही अधिक होगी। हम जानते हैं कि त्वरण " वेग परिवर्तन की दर को कहते हैं। "
अतः स्पष्ट है कि ग्रह के गुरुत्वीय त्वरण के उत्पत्ति का मुख्य कारण उस ग्रह का घूर्णन वेग ही है। उदाहरण के लिए पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमते हुए एक चक्कर लगाने में लगभग 24 घंटे लगते हैं जबकि चन्द्रमा को अपने अक्ष पर घूमते हुए एक चक्कर लगाने में लगभग 27. 3 दिन   लगते हैं।
   हमें यह साफ अन्तर दिखाई दे रहा है कि चन्द्रमा की अपने अक्ष परित घूर्णन गति पृथ्वी के मुकाबले बहुत कम है। जाहिर सी बात है कि जब घूर्णन गति कम होगी तो गुरुत्वाकर्षण या गुरुत्वीय त्वरण कम होगा।






पृथ्वी पर पानी होने और चन्द्रमा पर नहीं होने का कारण ( पलायन वेग द्वारा ) 


पलायन वेग :   जब हम किसी पिंड को पृृथ्वी से ऊपर की ओर फेेंकते है तो वह पृथ्वी पर वापिस लौट आता है। यदि हम पिंड वेग बढ़ातेे जाये तो एक वेग ऐसा आयेगा जिस वेग से पिंड को फेंके तो पिंड पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल से अधिक होने के कारण पृृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र को पार कर जायेगा। पलायन का मतलब ही यही होता है कि सदा - सदा के लिए एक स्थान को छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर जाना। 
   
 पलायन वेग वह न्यूनतम वेग है जिससे किसी पिंड को ऊर्ध्वाधर ऊपर की ओर फेकने पर पिंड पृृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र को पार कर जाता है तथा पृथ्वी पर कभी वापिस नहीं लौटता। 
पलायन वेग का 
सूत्र   ve √ (2gRe

जहाँ ve = पलायन वेग 
g = ग्रह का गुरुत्वीय त्वरण 
Re = ग्रह की त्रिज्या है।

 इस सूत्र से स्पष्ट है कि अगर जिस ग्रह का गुरुत्वीय त्वरण और ग्रह की त्रिज्या जितनी कम होगी उसका पलायन वेग उतना ही कम होगा। इसका मतलब यह है कि ग्रह पर वायुमंडल या वातावरण होने के कारण ग्रह का द्रव्यमान पर भी निर्भर करता है। 


पृथ्वी और चंद्रमा का पलायन वेग ( Earth and Moon's Escape Velocity ) 

 प्रयोग द्वारा पृथ्वी की 
त्रिज्या  R= 6. 37 × 106मीटर
गुरुत्वीय त्वरण g = 9.8 मीटर / सेकण2

सूत्र   ve = √ (2gRe)  से 

ve = √ (  2 × 9.8 ×   
6. 37 × 106   ) 
  पृथ्वी पर पलायन वेग = 11.2  किमी / सेकण 



चन्द्रमा पर पलायन वेग 
प्रयोग द्वारा चन्द्रमा की
 त्रिज्या  Re  = 1.74 × 106मीटर
गुरुत्वीय त्वरण g = 1.63 मीटर / सेकण2

सूत्र   ve = √ (2gRe)  से 


ve = √ (2 × 1.63 × 1.74 × 106    )  
पलायन वेग ve = 2.38 किमी / सेकण 






      हमारे वायुमंडल में पृथ्वी पर उच्चतम संभव ताप पर हल्के से हल्के अणुओं (  हाइड्रोजन के अणुओं ) का भी औसत (ऊष्मीय) वेग, पलायन वेग से बहुत कम है। उदाहरण के लिए, 500 K ताप पर हाइड्रोजन के अणुओं के का औसत ऊष्मीय वेग 2.5 किमी / सेकण है, जबकि पलायन वेग 11.2 किमी / सेकण है। अतः हाइड्रोजन के अणु ही नहीं बल्कि अन्य गैसें भी  पृथ्वी को छोड़कर नहीं जा पाते हैं। अतः पृथ्वी के चारो ओर वायुमंडल या वातावरण है। 
      हम देख रहे हैं कि चन्द्रमा पर पलायन वेग औसत ( ऊष्मीय ) वेग से कम है। यही कारण है कि चन्द्रमा पर पानी नहीं टीक पाता है। अगर हम चन्द्रमा पर पानी रख भी दे तो यह सूर्य की गर्मी ( प्रकाश की गर्मी ) से भाँप बनकर उड़ जाता है ( जल का ऊष्मीय चन्द्रमा के  वेग पलायन वेग से अधिक है इसलिए ) जबकि पृथ्वी पर जब जल वाष्प बनकर उड़ता है तो इनका जल का ऊष्मीय वेग पृथ्वी के पलायन वेग से कम ही रहता है। 
 यही कारण है कि पृथ्वी पर पानी का चक्रण बना रहता है और पानी पाया जाता है। 




आपको यह जानकारी कैसी लगी अपने कमेंट के माध्यम से जरूर बताएँ। धन्यवाद! 


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