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भावनाओं के उपयोग से अपने जीवन को कैसे खुशहाल और सफल बनाएँ ?


इस दुनियाँ में हम वो पा सकते हैं जो चाहते हैं पर शर्त यही है कि क्या हम जो पाना चाहते हैं उसके लायक हैं या फिर उतनी मेहनत कर सकते हैं ? अगर "हाँ" तो जरूर पा सकते हैं बस हमें अपने काम को बखूबी करने की आवश्यकता है। आज के इइस पोस्ट में हम ऐसी ही जानकारी लेने जा रहे हैं जो बहुत आवश्यक है। 


नोट :
अगर हमनें इस पोस्ट में दी गई जानकारी को बारिकी से समझ लिया तो हमें हर काम में सफलता मिलने की संभावना बढ़ जायेगी। क्योंकि हम यह जान चुके होगे कि हमें कब, कहाँ, क्या और कैसे करना है किसी काम को । हो सकता है कि कुछ लोगों को इसमें बताई गई बातें पल्ले ना पड़े, पर संभवतः समझाने का भरसक पुरा प्रयास किया गया है। हम भावनाओं को कितने हद तक अपने वस में कर सकते हैं  यह हमारी इच्छाशक्ति और प्रयत्न पर निर्भर करता है। 





   दुनिया का कोई भी शक्स ऐसा नहीं होगा जो बिना किसी भावना ( फिलिंगस् ) के हो क्योंकि बिना किसी भावना के कोई जिंदा ही नहीं रह सकता है। इस तरह हम यह भी कह सकते हैं कि हमारी जिन्दगी भावनाओं के कारण ही प्रभावित होती रहती है। शुरुआत में हमें यह भाव उभरने नहीं देंगे क्योंकि जबतक हम इसको समझेंगे तबतक देर हो जाती है पर निरन्तर अभ्यास करने पर इसमें अंतर आता-जाता है। जब हम अपनी भावनाओं का मनचाहे ढंग से उपयोग करना जान जाते हैं तब हमारी भावना हमारे लिए परेसानी नहीं बल्कि सफलता का कारण बनने लगती है। 



भावनाएँ ( The Feelings )






 मनुष्य के शरीर में अनेक प्रकार के हाव - भाव का उद्गम होता रहता है। ये भाव लाभ - हानि, धोखा - धड़ी, द्वेष आदि द्वारा ज्यादातर उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार मनुष्य की सभी परिस्थितियों में अलग - अलग भावों को एकसाथ व्यक्त करें तो हम इन्हें भावनाएँ कह सकते हैं। 
 वैसे तो भाव कई तरह की होते हैं पर यहाँ पर कुछ मुख्य भाव इस प्रकार हैं -

  1. ( रति ) प्रेम
  2. उत्साह ( ऊर्जा )
  3. हास्य 
  4. शोक
  5. विसम्या
  6. भय
  7. जुगुप्सा    और
  8. क्रोध 
 ये आठ प्रकार के भाव हैं जो मुख्य और स्थायी होत हैं जो मनुष्य के अन्दर रहते हैं। ये भाव ऐसे होते हैं कि हम सब पर भारी पड़ जाते हैं क्योंकि हम ये समझ ही नहीं पाते हैं कि इन भावनाओं का उपयोग कैसे करें कि हमें ज्यादा हानि न हो और हमारा काम आसानी से हो जाये। 

भावनाओं का सही इस्तेमाल कैसे करें ? 

  भावनाओं का इस्तेमाल करना इतना आसान भी नहीं होता है पर प्रयास करते - करते हम जरूर इसे सीख और समझ सकते हैं। 
कुछ भावनाएँ इतना प्रभावशाली होती है कि मनुष्य को पुरी तरह से अपनी गिरफ्त में ले लेती है और उस व्यक्ति को उससे बाहर ही नहीं निकलने देती है। जैसे - किसी  व्यक्ति को एकाएक कोई ऐसी घटना का पता चलता है जिससे उसे कोमा में जाने की नौबत आ जाती है तो इसका कारण यह है कि  ऐसा उन लोगों को होता है जो ऐसी भावनाओं को सही दिशा नहीं दे पाते हैं। अगर हम इन भावनाओं को किसी  भी तरह कम कर दें या फिर निकाल दें तो हम इनके कूप्रभाव से बच सकते हैं।
चलिए इसको अच्छी तरह से समझने का प्रयास करते हैं - 
अगर हम किसी नदि को बाँध दें और जब पानी धिरे - धिरे बढ़ता जाये तो एक समय ऐसा आयेगा कि नदी का पानी इतना
 बढ़ जायेगा कि ये बाँध के ऊपर से होकर गुजरने लगेगा। यानी अब बाँध डूब जायेगा और अगर हम इस पानी को निकलने के लिए सही दिशा या रास्ता नहीं देंगे तो यही पानी बाँध को भी तोड़ सकता है और बाढ़ भी आ सकती है। अगर बाँध बँधा है और पानी एकाएक बढ़ जाये तो नदी के बाँध पर एकाएक ( अचानक ) दबाव बढ़ जायेगा ठीक ऐसा ही मनुष्य के साथ भी होता है जब उसे किसी ऐसी घटना का पता चलता है कि उसपे बहुत ज्यादा दबाव हो जाता है। ऐसी ही परिस्थिति  हार्ट में अटैक होने की संभावना होती है। 
   तो कहने का मतलब यह है कि भावना भी इसी तरह से काम करती है अगर हम इसे अपने दिलों दिमाग के द्वारा बाँध कर रखते हैं तो एक दिन आप भावना से भर जायेगें और यह भावना निकलने के लिए रास्ता खोजेगी। अगर आपने / हमने इसे सही रास्ता नहीं दिया तो यह पानी की तरह बाढ़ यानी बिमारियों को बढ़ाने लगेंगी। 




 दूसरा उदाहरण अगर किसी को बहुत ही दुख होता है किसी प्रियजन के गुजर जाने से  तो दुख की भावना की लहर उठने लगती  है और हमें रोने का मन करता है। अगर हम नहीं रोते हैं तो हम ज्यादा समय तक दुखी होते रहेंगे। ऐसी भावनाओं को दबाकर नहीं रखना चाहिए नहीं तो यह बिमारियों को बढ़ावा देने का जरिया बन जायेगा और अगर जी भरके रो लेते हैं तब दुख वाली भावना रोनेे के माध्यम से हमारे शरीर से बाहर निकल जाती है और हमें हल्का महसूस होने लगता है। इस उदाहरण को भी बाँध द्वारा आसानी से समझा जा सकता है। जैसा कि हमने अभी - अभी पढ़ा है कि हमें जब किसी सोक भावना के होने से रोने का मन करे तो जी भरकर रो लेने से हम हल्का महसूस करने लगेंगे तो बात यह है कि जैसे बाँध के द्वारा पानी बँधा होता है तबतक यह नदी के लिए भारी होता है और जब इसे खोलकर बहा दिया जाये तो नदी खाली होगी और नदी में पानी हल्का होगा बिल्कुल इसी तरह हमारे शरीर से नेगेेेटिव ऊर्जा को बाहर निकलने  का रास्ता मिल जाता है तो हमारा शरीर भी नदी की तरह हल्का महसूस करने लगता है । 

दरअसल हमारे शरीर की हर क्रिया ऊर्जा के द्वारा ही होती है चाहे बोलना हो, सोचना हो, हँसना हो या फिर रोना हो सभी क्रियाकलापों में ऊर्जा ही लगती है। आइए और सरल उदाहरणों को लेकर देखते हैं। 
हमारा शरीर किसी मशीन की तरह है जिसमें जैसा इनपुट मिलेगा वैसा ही आउटपुट मिलेगा। हमारे शरीर के लिए इनपुट का काम आँख, कान और नाक हैं । मुँह आउटपुट का काम करता है। हाव - भाव के आधार पर आँख, कान और नाक भी आउटपुट का काम करते हैं। ये सभी कैसे कार्य करते हैं इनके बारे में भी जान लेते हैं। 
  जब एक व्यक्ति दुसरे व्यक्ति से कुछ कहता है तो सुनने वाले व्यक्ति तक वह बात ऊर्जा के रूप में पहुँचती है। इसके बाद सुनने वाले के दिलों - दिमाग में यही बात ऊर्जा के रूप में उसके शरीर में प्रवेश कर जाती है। अब बात यह है कि बोलने वाले ने क्या कहा है तभी तो हमें यह पता होगा कि सुनने वाले को कैसी ऊर्जा मिलेगी। अगर साकारात्मक बात कही जाये तो सुनने
वाला भी सकारात्मकता का अनुभव करेगा। और अगर क्रोध वाली बात कही जाए तो सुनने वाला भी क्रोधित ही होगा। या फिर अगर हँसी वाली बात कही जाये तो हँसी ही आयेगी। इसमें एक स्थिति यह भी है कि सुनने वाला किसी अन्य तीव्र भावना में ना हो नही तो ऐसा नहीं होगा। जैसे मान लिया की अगर कोई व्यक्ति अति दुखी है और उसे हँसी वाली बात सुनाई जाये तो भी वह हँसेगा नहीं बल्कि उसे गुस्सा ही आयेगा। अगर उसे हँसना है तो सबसे पहले उसके अंदर से दुख की भावना को बाहर निकालना होगा और यह सब उसे अपने दुख को किसी समझदार व्यक्ति के सामने व्यक्त / प्रकट करना चाहिए। ऐसा करने से दुख वाली ऊर्जा निकलने लगती है और व्यक्ति को हल्का या आरामदायक महसूस होने लगता है। फिर इसके बाद अग हँसी वाली बात कही जाए तो अब ज्यादा सम्भावना है कि उसे हँसी आयेगी। क्योंकि अब उसके अंदर कोई ऐसी तीव्र भावना ही नहीं है जो उसे हँसने से रोक सके। 

इसी तरह से हम घातक ऊर्जा वाली भावनाओं को रास्ता देकर बाहर निकाल सकते हैं और इनके कूप्रभाव से बच सकते हैं।


उम्मीद है कि ये पोस्ट हमें सक्षम बनायेगा। अगर आपका कोई प्रश्न है तो कमेंट जरुर करें। धन्यवाद..


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  2 / 5 = ( 2 / 5 )  × 100 = 40 %    2 / 5 = ( 2 / 5 ) × 100 % = 40 %  2 / 5 = 40 / 100 = 40 %


    इन तीनों में पहला गलत है और बाकी दोनों सही हैं। क्योंकि पहली वाले हल में हमें यह स्पष्ट दिख रहा है कि अगर हम 100 में भाग करें तो 2 × 20 = 40 तो मिलेगा पर हर के स्थान पर हमें 100 मिल ही नहीं रहा है तो इसे हम प्रतिशत के रूप में कैसे लिख सकते हैं। अतः यह गलत है। रही बात बाकी दो तरिकों की तो इन दोनों में ही हमें हर के स्थान पर 100 मिल रहा है। दूसरे वाले विकल्प में 1 / 100 = % लिखा गया है।





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