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संभावनाओं का सागर

17 Oct 2019

सूर्य के प्रकाश में सात रंग क्यों होता है ?


   सूर्य ☀ के प्रकाश में सात रंग होते हैं यह लगभग हर शक्स जानता ही होगा। पर यह क्यों होता है यह बहुत कम लोग ही जानते होंगे। इस सवाल का जवाब जानने से पहले हमें एक और महत्वपूर्ण सवाल देखना अतिआवश्यक है और वो है सूर्य के प्रकाश के रंग का विशेष क्रम में होना - लाल (Red) , नारंगी(Orange, पीला(yellow)  हरा(Green), आसमानी (Sky), नीला (Blue) तथा बैगनी( Violet)

    



      आखिर इसी क्रम में ही क्यों होते हैं ये सभी रंग ? 
इससे पहले हम पहले सवाल का जवाब /उत्तर देख लेते हैं। 



सूर्य के प्रकाश में सात रंग क्यों होते हैं ?

  सूर्य के प्रकाश में सात रंग नहीं बल्कि विभिन्न प्रकार के रंग होते हैं और यह इतनी तिव्रता से बदलते हैं कि हमारी आँखेें इन सभी रंगों को देखने में सक्षम नहीं होती है और देख नहीं पाती है ।  हमारी आँखें केवल उन्हीं सात रंगों ( लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला और बैगनी )  को देख पाती है जो परिणामी रुपसे स्थिर होते हैं और आँख की क्षमता के अनुरूप होते हैं । इस तरह हम कहते हैं कि सूूर्य के प्रकाश में सात रंग ही होते हैं। इस घटना को यह कहावत पुरी तरह से सूट करती है " जो होता है वह दिखता नहीं और जो दिखता है वह होता नहीं है " 






  सूर्य के प्रकाश के रंग विशेषक्रम में क्यों होते हैं ? 


    सूर्य के प्रकाश के सात रंग लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला और बैगनी इसी क्रम में ही क्यों होते हैं ? यह सवाल बहुत ही महत्वपूर्ण है। 

    दरअसल प्रकाश के रंग और ऊष्मा दोनों में गहरा संबंध होता है। जैसी ऊष्मा वैसा रंग होता है। इन सातों प्रकाशीय रंगों में सबसे कम ऊष्मा लाल रंग की और सबसे ज्यादा ऊष्मा बैगनी रंग की होती है। जब सूर्य से ऊष्मा निकलती तो यह प्रकाशीय रंगों के रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान तक संचरित होती है। 
    प्रकाश की ऊष्मीय ऊर्जा समान रूप से 360° डिग्री का कोण बनाते हुए हर संभव दिशााओं  में संचरित होती है। इस प्रकार प्रकाशीय रंगों का का एक वृत्त बन जाता है जिसके सबसे बाहरी भाग में लाल रंग और सबसे आन्तरिक भाग में बैगनी होता है। 




पर यह इतने पास - पास होतें हैं कि आँखें इनमें अन्तर नहीं कर पाती हैं पर जैसे ही ये प्रकाश किसी विचलन भरेे माध्यम से होकर गुजरतेे हैं तो इनके बीच की दूरी बढ़ जाती है और इनकी ऊष्मीय ऊर्जा में कमी भी हो जाती है। इसलिए हमें ये सातों रंग आसानी से दिखने लगते हैं। 

   यही कारण है कि ये सभी सातों प्रकाशीय रंग लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला और बैगनी  को इस क्रम में रखा या लिखा जाता है। 
इस तरह श्वेत (सफेद) प्रकाश की ऊष्मा इन सभी सातों रंगों से अधिक होती है या इन सभी के योग के लगभग बराबर होती है। क्योंकि हम जाानते हैं कि इन सातों प्रकाशीय रंगों से मिलकर ही श्वेत प्रकाश बना है। 
    



 प्रकाशीय रंगों का व्यवहारिक जीवन में उपयोग। (Use of optical colors in practical life. )

  
    प्रकाशीय रंगों के निम्नलिखित ऊपयोग देखिए - 
  • श्वेत प्रकाश को ज्यादा समय तक देखने से हमारी आँखें और सर गर्म होता है। 
  • आँखों को जल्दी से ठँडा करने के लिए हमें काला / काली वस्तुओं को देखना चाहिए। 




  



यह आर्टिकल पढ़ने के बाद आपको कैसा लगा। अपने महत्वपूर्ण सुझाव हमसे जरुर शेयर करें। धन्यवाद !

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8 Oct 2019

Possibilityplus का नया logo

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 धन्यवाद ! 




5 Oct 2019

Isro ( इसरो ) ka fullform.



  इसरो का पुरा नाम    






इसरो का पुरा नाम क्या है ?
इसरो का पुरा नाम ( हिन्दी में ) 
" भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन " है।




ISRO fullform in english 
I  = Indian
S = Space 
R = Research 
O = Organisation 








      ISRO भारत में कहाँ पड़ता है ?     

    इसरो का मुख्यालय भारत के कर्नाटक राज्य की राजधानी बैंग्लोर ( बैंगलुरू ) में है। इसरो का पुरा नाम जानने के बाद यह पता चलता है कि यह भारत के लिए अंतरिक्ष कार्यक्ररमों को बढ़ावा देेन के लिए है। इसी संस्था के कारण हम मोबाईल 📱,  टीवी 📺, इंटरनेट आदि का उपयोग कर पा रहे हैं। यही संस्था उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजकर उन्हें एक निश्चित कक्षा में स्थापित करती है जिससे वह संबंधित जानकारी देता रहे। 


इसे भी पढ़ें 👇
 LKG&UKG fullform 





आशा है आपके लिए यह पोस्ट उपयोगी साबित हुआ होगा।


25 Sep 2019

शब्दों की ऐसी जानकारी जो जिंदगी बदल देगी..




  हते हैं कि ज्यादा बोलना हमारे लिए सही नहीं होता है , ज्यादा बोलने से काम बिगड़ जाते हैं ।  हम जिस भी काम के बारे में काम से ज्यादा बात करते हैं तो वह काम या तो होता नहीं या फिर जैसेे-तैसे ही हो पाता है। काम बिगड़ने के अनगिनत कारण हो सकते हैं पर इन सभी कारणों की उत्पत्ति ज्यादा बोलने से ही संभव होता है।
 ऐसा क्यों होता यह कोई नहीं जानता। है ना पर इस आर्टिकल में हम इसके बारे में कुछ ऐसे वैज्ञानिक और तार्किक उदाहरण देखेंगे जो बहुत हद तक इसके सवालों    से पर्दा हटा देगा। तो चलिए देर किस बात की जानते हैं यह जानकारी।





ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती और ना ही समाप्त ( Energy can not be generated nor ended ) 

    
    इस आर्टिकल को समझने के लिए यह नियम बहुत महत्वपूर्ण है। इसलिए इसको पहले जान लेते हैं। 
 इसे ऊर्जा संरक्षण का नियम कहते हैं। यह सर्वव्यापी नियम है यह हर स्थान, हर समय और हर प्रकार की वस्तुओं पर अनिवार्य रुप से लगता ही लगता है। इसके अनुसार अगर हम किसी भी वस्तु को ऊर्जा के रूप में बदले तो ठीक ऊतनी ही ऊर्जा मिलेगी जितनी की पहले वस्तु में थी। जैसे : अगर हम किसी वस्तु को जलाएँ तो इसकी ऊर्जा ( ऊष्मीय, प्रकाशीय, ध्वनि आदि ) कई रुपों में परिवर्तित हो सकती है पर कुल ऊर्जा नियत या एकसमान ही होगी। 
इससे यह पता चलता है हम जो भी बात बोलते उन सबकी ऊर्जा एक व्यक्ति से दूसरे और दूसरे से तिसरे व्यक्ति तक होते हुए हमेशा किसी ना किसी रूप में चलती रहती है पर समाप्त नहीं होती है । यही कारण है कि हम अपनी कही गई बातों में हमेशा फंसे रहते हैं क्योंकि बातें ऊर्जा हैं और ऊर्जा को समाप्त किया नहीं जा सकता है । और इस तरह से हमारी कही गई बातें ना जाने किस किस ऊर्जा में बदलती हुई एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में प्रवेश करती रहती है। 









 द्रव्यमान ऊर्जा का ही स्वरूप होता है । 

The mass of energy is the same form. 

       दुनियाँ में जो भी वस्तु है उसका कुछ न कुछ द्रव्यमान होता है। द्रव्यमान को ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है। जैसे किसी वस्तु को अगर जलाएँ तो उस वस्तु का द्रव्यमान मुख्यतः ऊष्मीय ऊर्जा में बदल जाता है। यह कोई परिकल्पना नहीं है बल्कि एक महान वैज्ञानिक की खोज है। 


   महान वैज्ञानिक आइन्स्टीन ने यह सिद्ध किया कि द्रव्यमान को ऊर्जा में बदला जा सकता है। क्योंकि द्रव्यमान ऊर्जा का दूसरा रुप है। उन्होंने इसका सूत्र भी दिया। 
E = mc2 

  जहाँ c = 3 × 108  मीटर / सेकण्ड. प्रकाश की चाल है। इस समीकरण को आइन्स्टीन का द्रव्यमान - ऊर्जा समीकरण कहते हैं। इस सूत्र से यह स्पष्ट हो रहा है कि किसी भी द्रव्यमान को पुरी तरह से ऊर्जा में बदलने के लिए ( अत्यधिक गति द्वारा ) 3 लाख किलोमीटर/सेकण्ड की चाल भी होना चाहिए। इतनी ज्यादा गति से लगभग हर प्रकार की वस्तुएँ अपने छोटे - छोटे टुकड़ों में बट जायेगी जो ऊष्मीय ऊर्जा के रूप में परिवर्तित होकर  संबंधित माध्यम विलीन हो जाते हैं और हमें दिखाई नहीं देते ।

  किसी  वस्तु को ऊर्जा में बदलने के लिए हमें बस उस वस्तु को किसी भी तरह से  उसके मूल कणों में बदलने की जरूरत होती है चाहे हम गति का उपयोग करते हुए करें या किसी अन्य तरिके से करें। 
इससे एक बहुत बड़ी बात सामने निकलकर आती है कि हमारा शरीर एक ऊर्जा ही है जो अपनी धीमी गति और शरीर कणों का एक साथ होने के कारण द्रव्यमान के रूप में दिखाई दे रहा है। इसका मतलब यह हुआ कि हम जो भी करते हैं या फिर सोचते हैं, बोलते हैं, सुनते हैं। ये सभी क्रियााएँ हमारे शरीर में ऊर्जा के रूप में ही कार्य को संपन्न होती हैं । और यही कारण है कि हम बोलना, सुनना, कहना, हवा का चलना आदि क्रियााओं देख नहीं सकते हैं क्योंकि ऊर्जा स्वयं दिखाई नहीं देती है लेकिन इससे होने वाली क्रियाओं को देखा या महसूस किया जा सकता है। अगर हम बिना कुछ खाये कोई भी काम करें तो हम दुबले - पतले हो जाते हैं। पता है क्यों क्योंकि हमारे शरीर का द्रव्यमान ऊर्जा में बदलने लगता है और हमारा वजन कम होने लगता है। अगर हम कोई काम ना भी करें सिर्फ चलें - फिरें, या बोलें तो भी हमें कुछ तो ऊर्जा चाहिए ही होगी।



ज्यादा बोलने से काम क्यों नहीं बनता ? 




   अब हम जाानते हैं कि हमारे  ( बढा़ चढ़ाकर ) बोले गये शब्द हमें कैसे असफलता देते हैं। हमने यह बात तो स्पष्टतः जान ली है कि हमारे शरीर में जो भी कुछ है या होता है, वो सब एक ऊर्जा है। तो इसका मतलब यह है कि हम जब कुछ करना चाहते हैं तो यह चाहत वाली ऊर्जा हमारे शरीर में प्रवेश कर जाती है पर जब हम इसी चाहत को अपने शब्दों में बयाँ करते हैं तो इस ऊर्जा में कमी होने लगती है। इस तरह हमारी यह चाहत कम हो जाती है और हम उस काम को या तो अच्छे से नहीं कर पाते हैं या कर ही नहीं पाते हैं। हमें उस काम को  सही से करने के लिए फिर से वही चाहत वाली ऊर्जा की जरुरत होती है। इसी बात को हम साधारण शब्दों में यह कहते हैं कि मेरा मन नहीं कर रहा है.. काम को करने का। हमारा मन किसी कार्य को करने को कहता है तो इसके पीछे एक इच्छा वाली ऊर्जा होती है जो मन को करने या उस वस्तु को पाने के लिए कहती है। पर जब हम इस इच्छा को शब्दों में बयाँ करते हैं तो यह ऊर्जा कम होने लगती है। लेकिन अब आप सोच रहे होंगे कि जब हम कुछ कहेंग ही नहीं तो कोई काम करेगें कैसे ? है ना !




   जिस प्रकार किसी भी वस्तु का एक सीमा ( लिमिट ) में हम उपयोग किया जाए तो वह सबसे उपयुक्त (  सही ) होता है। इसी प्रकार अगर हमारे मन में कोई इरादा / इच्छा है तो इसे ऐसे जगह पर प्रकट करना चाहिए जहाँ इसकी वाकई में जरूरत हो और हमें यही वाली ऊर्जा मिले यानी जहां हमें हमारे काम को समर्थन मिले ऐसी जगहों पर हमें अपनी बात रखनी चाहिए । बेवजह या बार - बार इसे सबके सामने न प्रकट करें क्योंकि ऐसा करने से आपकी यह इच्छा समाप्त होने लगेगी क्योंकि यह एक ऊर्जा है और इस इच्छा को प्रकट करने के लिए इसके ऊर्जा में कमी आ जायेगी। कमी आयेगी तो हमारे मन में इसका सीधा असर दिखाई देता है। जब इसकी ( इच्छा ) में कमी होगी तो वही काम अब करने को मन नहीं कहेगा।  पर इसका मतलब यह नहीं है कि इस इच्छा को बढ़ाया नहीं जा सकता है, बढ़ाय जा सकता है पर कैसे  ?


    ✴️ जानने के लिए निचे पढ़ते हैं.. 



 इच्छा वाली ऊर्जा को बरकरार कैसे रखें ? 

How to keep the energy you desire ?


          कोई भी इच्छा / मन का घटना - बढ़ना हमारे उपयोग पर निर्भर करता है। अगर कोई इच्छा घट रही है तो इसका मतलब यह है कि हम सिर्फ इस ऊर्जा का उपयोग तो कर रहे हैं पर इस ऊर्जा को बरकरार रखने के लिए कोई कार्य नहीं कर रहे हैं। जो इच्छा या चाहत हमारे अंदर है वो कहाँ से और कैसे आयी है यह पता करलो क्योंकि जब हमें इसकी जरूरत या कमी होगी तब हम यहाँ से इस ऊर्जा को लेकर अपनी इच्छा को फिर से बढा़ सकते हैं। जैसे हमें भुख लगती है तो हम खाना खा कर अपनी ऊर्जा बढा़ लेते हैं बिल्कुल ऐसे ही हमें अपनी मंजिल पाने के लिए अपनी जो भी अच्छी इच्छा या चाहत है उसे बार बार जगाना होगा या विज्ञान कि भाषा कहे तो में ऊर्जा की जरूरत होगी।


   अगर आप अपनी इच्छा को बहुत कम जाहिर करेगें तो भी उसे पुरा होने में कठिनाई आ सकती है। इसके निम्नलिखित कारण हो सकते हैं -

  • समय-समय पर इच्छाओं में बदलाव। 
  • किसी तीव्र इच्छा का उत्पन्न होना। 
  • इच्छा में कमी आना। 

इसलिए कहा गया है कि किसी भी काम को बिना उचित कारण कभी टालना नहीं चाहिए। 

   शायद इसीलिए बहुत से लोग अपने काम या इच्छा को बिना किसी को बताए ही करते हैं और वो सफल भी हो जाते हैं। पर कुछ काम ऐसे होते हैं जो बिना बताए किया भी नहीं जा सकता है। ऐसे काम को करना ही थोड़ा कठिन होता है। सबसे कठीन वह काम  होता है कि जिसे हम चैलेंज के साथ करने को कहते हैं। क्योंकि हम जब ऐसा कहते हैं तो उस समय हमारी भावना या इच्छा बहुत अधिक होती है और इसके चलते हम अपनी इस भावनात्मक ऊर्जा को अपने शब्दों द्वारा बाहरी वातावरण में जाने - अनजाने में ही कुछ ज्यादा ही व्यर्थ कर देते हैं। और जब यह ऊर्जा बाहर निकल जाती है तो हम शांत हो जाते हैं क्योंकि ऊर्जा में कमी आ जाती है और उस काम को करने के लिए मन नहीं करता है जिसे हम कह रहे थे। 


   हम सब इतना तो जानते ही हैं कि जो व्यक्ति जितना ज्यादा बोलता है वह उतना ही कम काम करता है और ऐसे व्यक्ति को हम अक्सर बड़ बोला, फेंकु, बहँसु आदि कहते हैं। इन सबके पिछे ऊपर के बताये गये कारण जिम्मेदार हो सकते हैं । 

    अधिकाशं लोग ऐसे भी होते हैं जो जान ही नहीं पाते हैं  कि असल में यह सब जो उनके साथ हो रहा है ये उनके गलत शब्दों या गलत जगह के बोलने के चलते हो रहा है। अगर साधारण शब्दों में कहा जाये तो लगभग 90% या इससे भी अधिक हमारे जीवन में गलत होने का कारण गलत जगह पर गलत शब्द को बोलना है। कुछ ऐसे ही शब्द देखते हैं कि ये भी ऊर्जा वाले कांसेप्ट फर खरा उतरता है कि नही। 








मैं यह काम जिंदगी में किसी भी कीमत पर नहीं करूँगा / करूँगी । 

I will never do this work in life.    




       जी हाँ अगर आप ऐसी कोई बात कहते हैं कि मैं यह काम तो किसी भी किमत पर और कभी नहीं करूँगा/ करूँगी तो यह बात आपका फ्लो ( पिछा करना ) करने   लगेगी  और   लगभग  90%  से  भी   ज्यादा संभावना है कि एक ना एक दिन वह काम आपसे करवाकर ही छोड़ेगी । दरअसल जब भी हम कोई ऐसी बात क्रोध, या घमंड से भरी ऊर्जा के साथ बोलते हैं वह ऊर्जा हमारे हाव - भाव तथा शब्दों के माध्यम से से हमारे शरीर के बाहर चली जाती है और हम ठीक इसके अगले ही पल क्रोध, गुस्सा से मुक्त हो जाते हैं। इस प्रकार की बातें हम जिससे कहेंगे उसको जरूर लगेगी ( उसके अंदर यह ऊर्जा  चली जायेगी ) और उस व्यक्ति के मन में विरोधाभास हो जाता है और यह ऊर्जा वह अपने पास रखना नहीं चाहेगा क्योंकि उसे यह ऊर्जा चुभेंगे जिसे जलन भी कहते हैं और जैसे ही मौका मिलेगा वह अपनी जलन को शांत करने के लिए उसे कुछ कहेगा या कुछ ऐसा करेगा जिससे इस जलन रुपी ऊर्जा को अपने अंदर से निकाल सके। तो इस तरह से भावनाएँ, चाहत या इच्छा एक स्थान से दूसरे स्थान तक ऊर्जा के रूप में आती - जाती हैं। 



 इसीलिए हमें कोई भी बात कहने से पहले एक बार जरूर सोचना चाहिए क्योंकि हम जो भी कुछ कहते हैं वो एक ऊर्जा होती है और यह ऊर्जा अपनी दिशा और दशा बदलती है पर समाप्त नहीं होती है, और इस बात से भी हमेशा बचने की कोशिश जरूर करें कि जब भी कोई बात कहें तो उसमें घमंड ना शामिल हो । क्योंकि अगर हम घमंड या क्रोध के साथ कोई भी बात करते हैं तो इस तरह की बातों में अत्यंत तीखी ऊर्जा होती है ( बिल्कुल सुई के समान चुभती है ) और इसी कारण से ऐसी बातें सुनते ही किसी को भी गुस्सा, क्रोध आ जाता है। जो आदमी ऐसी बातें सुनकर इस ऊर्जा को वापस नहीं करता है तो इसका मतलब यह है कि वह उस व्यक्ति को और क्रोधित नहीं करना चाहता है या उसके झगड़े में नहीं पड़ना चाहता है। लेकिन वह इस बात को सह नहीं सकता है और इस ऊर्जा को किसी अन्य के सामने जरुर निकालेगा या फिर खुद से बातें करके इस जलनरुपी ऊर्जा को व्यर्थ कर देगा। 







सीख : 1. ऐसी ऊर्जाओं का इस्तेमाल कर हम किसी बड़े काम को आसानी से करके जीवन में आगे बढ़ सकते हैं। 

2. कोई ऊर्जा बुरी नहीं होती है बल्कि हमारे उपयोग इन्हें अच्छा - बुरा बनाते हैं। 

इसलिए ऐसी ऊर्जा को व्यर्थ नहीं करना चाहिए। किसी अच्छे काम में इसका उपयोग करना चाहिए। ऐसा करने वाले ही आज उँची शक्शियत के मालिक हैं।




किसी काम को टालने वालो के लिए निचे अच्छी सीख है इसे भी पढ़कर हमसे अपने विचार जरुर शेयर करना। धन्यवाद... 




चलो यह काम कल तो हो ही जायेगा। 


क्या आप भी बहुत बार ऐसा कहते हैं तो आज से ही यह आदत सुधार लो क्योंकि ऐसे कामों का हो पाना लगभग मुश्किल हो जाता है । याद करिए आप सभी ने बहुत बार ऐसा जब कहा होगा तब वह काम किसी ना किसी वजह से जरूर रूक गया होगा। शायद इसीलिए यह कहा जाता है कि 

काल करे सो आज करे, आज करे सो अब, पल में परलय होगी बहुरी करेगा कब ।  "    

इसका मतलब साफ है कि हम अगर किसी काम को कल करने की बात करते हैं तो उसे आज ही कर लेना चाहिए ( अगर संभव हो तो  ) और जिस काम को हम आज करने की बात करते हैं उसे अभी के अभी करने की कोशिश करना चाहिए ।
दरअसल हम अगर कोई बात सोचते हैं या फिर कहते हैं कि यह... काम या वह... काम किसी अन्य समय में करेंगे तो क्या गारंटी है कि उस समय आप उस काम को करने के लिए आपके पास समय हो या फिर आप वहाँ हों जहाँ पर आपको काम था । यह भी तो हो सकता है कि आपको उसी समय कोई बड़ा और उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण और जरूरी काम आ जाये जिस समय में आपने एक काम सोच रखा था ।
 दरअसल हम जो काम या बात सोचते हैं केवल उसी बात या काम की संभावना नहीं होती है बल्कि उसके अलावा भी बहुत कुछ होता है जो होने वाला होता है। 

इस बात को सही से समझने के लिए मान लिजिए किसी प्रतियोगिता में दो लोग शामिल हैं और एक - दूसरे के आमने सामने हैं । यदि पहला प्रतियोगी दूसरे प्रतियोगी से यह कहता है कि यह प्रतियोगिता तो मैं ही जितुँगा तो यह बात स्पष्ट है कि दूसरा प्रतियोगी पहले प्रतियोगी को हराने की पूरी कोशिश करेगा क्योंकि अब उसे खुली चुनौती ( open warning ) वाली ऊर्जा मिल गयी है जो उसके मान - सम्मान को ठेस और जलन पैदा कर देती है। वह इस ऊर्जा को बाहर निकालने के लिए बेचैैनी के साथ अधिकतम प्रयास करेगा। अगर पहला प्रतियोगी कुछ भी नहीं कहता तो शायद दूसरा प्रतियोगी इतने जूनून के साथ प्रतियोगिता में भाग नहीं लेता  और ना ही जीतता।  यहाँ पर दूसरा प्रतियोगी के जितने की संभावना और बढ़ जाती है क्योंकि वह अब प्रतियोगिता जितने के लिए जी जान लगा देगा।  इस कहानी से एक बात स्पष्ट हो रही है कि अगर आप कोई ऐसी बात कहते हैं जिसमें घमंड, किसी को निचा दिखाना, अतिरिक्त विश्वास (over confident) आदि हो तो ऐसी बातों में जलन या विरोध वााली ऊर्जा अत्यंत तीव्र और प्रभावी होती है। यही कारण है कि ऐसी बाातें सुुनकर हर व्यक्ति जलन और क्रोध का शिकार हो जाते हैं।
निचे दिए गए शब्दों को जितना हो सके मत बोलिए :


  • किसी बात, वस्तु, अपने गुणों आदि पर घमंड करना। 
  • कल तो यह ... काम कर ही लेंगे  ( ओवर कान्फिडेंट के साथ  ) 
  • मुझसे बड़ा चालाक कोई नहीं । 
  • कोई भी परेशानी हो ही नहीं सकती, हुई या होगी । 








क्या आप जानते हैं जो लोग अच्छे खासे अमीर होते हैं फिर भी ऐसी बातें करते हैं कि आप सुनोगे तो आपको यही लगेगा कि अरे यह तो अच्छा खासा धनी है फिर बातें ऐसे कर रहा है जैसे कि यह तो बहुत ही गरीब हो। ऐसे लोगों के अमीर होने की कुछ बातें इस प्रकार है - - 
  • ये लोग अपने आपको बड़ा - चढ़ाकर नहीं बताते हैं। 
  • ये लोग अपने काम को टालते नहीं। 
  • ये लोग अपने बारे में बहुत ही कम जानकारी देते हैं। 
  • ये लोग प्रायः कम बोलने वाले होते हैं ।
  • ऐसे लोग स्वार्थी भी होते हैं। 
  • ऐसे लोग फेंकु नहीं बल्कि बटेरूँ होतें हैं। 



 ये लोग ऐसा क्यों बोलते हैं और इनके ऐसा बोलने पर इनको क्या फायदा होता है, इसका जवाब आपको मिल गया होगा । अगर आप में भी यह आदत आ जाये तो आप या हम सब अमीर बनने की एक सीढ़ी ऊपर चढ़ जायेंगे। 




माता-पिता अपने बच्चों की बडा़ई.. नहीं करते.... 

बहुत लोग यह सोचते हैं कि मेरे माता-पिता  मेरी बडा़ई क्यों नहीं करते हैं जबकि मैं तो बहुत अच्छा काम करता हूँ। दरअसल हर माता - पिता  अपने की तारीफ तो खुलकर करना चाहते हैं पर उससे पहले ज्यादा जरूरी यह होता है कि उनके बच्चे पर किसी की बुरी नजर ना लगे। और सत्य यह है कि बडा़ई तब करना चाहिए जब आवश्यक हो बिना मतलब यानी किसी के सामने अपने या अपने बच्चों की सराहना करना भारी पड़ सकता है। क्योंकि बिना आवश्यक की सराहना करना घंमड के दायरे में आता है। यह बात तो हम सब जानते हैं कि घमंड बहुत ही बुरी बात है यह बड़े से बड़े गुण को  नष्ट कर देती है । इसलिए हमारे माता-पिता  हमारी प्रशंसा बहुत कम करते हैं । इस बात से बहुत से लोग अपने माता-पिता  को यह कहने लगते हैं कि इनको मेरा कोई मोल ( मान )  ही नहीं है और भला - बुरा भी कहने लगते हैं ।  आशा है कि यह जानकारी आप सभी के लिए उपयोगी होगी ।



आपको क्या लगता है हमें कमेन्ट करके जरूर बताएँ 
ऐसी ही एक से बढ़कर एक जानकारियों को पाने के लिए अभी इस साइट www.possibilityplus.in  को follow  करें।




  Thanks for Reading.. 








22 Sep 2019

लोहे या किसी धातु से चिपके कागज को जलाने पर जलता नहीं, क्यों ?




   लोहा हो या कोई अन्य ( ताँबे, स्टील, जस्ते, एल्युमीनियम आदि ) धातुएँ हों अगर उनसे कोई सुखा कागज लपेटकर जलाएँ तो कागज जल्दी नहीं जलता है।




 नोट:  यहाँ पर ध्यान देने वाली बात यह है कि ऐसा तब होता है जब कागज किसी एक पेज को ही धातु पर लपेटा जाये। अगर बहुत सारे पेज / पन्नों को एकसाथ लपेटकर किसी मोमबत्ती / चिराग से जलाएँ तो भी सबसे ऊपर के पन्ने जलने लगेगें। इसके कारणों को निचे बताया गया है। 


जबकि बिना लोहे, ताँबे, स्टील, जस्ते, एल्युमीनियम आदि के ऊपर लपेटे कागज को जलाएँ तो वह तुरंत ही जलने 🔥 लगता है।




 ऐसा क्यों होता है ?
चलिए जानते हैं >>>>>>>



     कागज  ऊष्मा का अचालक या कुचालक होता है यह हम सब जानते हैं। अगर नहीं जानते हैं तो इसे भी जान लेते हैं। 


 ऊष्मा के  अचालक / कुचालक 

            वे पदार्थ जिनमें ऊष्मा का चालन नहीं होता हैं या जिनमें ऊष्मा का चालन ना के बराबर होता है उन्हें ऊष्मा के अचालक या कुचालक कहते हैं। 
जैसे : कागज, लकड़ी, प्लास्टिक, कपड़े  आदि।






  इस प्रकार की वस्तुओं के कणों में ऊष्मा संचरण इतनी मंद गति से होता है कि तब तक वह वस्तु ही जलने लगती है। इनके इसी व्यवहार के कारण इन्हें ऊष्मा का कुचालक कहते हैं। इनमें ऊष्मा का संंचार / संचरण क्यों नहीं होता है यह समझना बहुत जरूरी  और वैज्ञानिक भी है।  दरअसल कुचालक वस्तुओं के कण इतनी दूर - दूर होतें हैं कि इनमें ऊष्मा का संंचार / संचरण लगभग नगण्य होता है। और परिणामस्वरूप वस्तु गर्म होकर जलने लगती है।






   इसे अच्छे से समझने के लिए दो कागज के टुकड़े ले लिजिये और दोनों को कुछ दूरी पर रखकर किसी एक कागज को जलाएँ तो हम देखेंगे कि कागज के जिस टुकड़े में हमने आग लगाई थी केवल वही जला है और जबकि दूसरा कागज का टुकड़ा हल्का सा गर्म हुआ होगा पर जला नहीं। 


     कुछ इसी तरह से कुचालक वस्तुओं के कण आपस में अलग-थलग होते हैं और ऊष्मा का संंचार नहीं कर पाते हैं। कुचालक वस्तुओं के वजन और घनत्व भी इनके कणों के बीच की अत्यधिक दूरी के कारण ही कम होता है । 

इनमें  ऊष्मा का ही नहीं बल्कि विद्युत ऊर्जा का भी संचरण नहीं होता है। इस तरह ये विद्युत ऊर्जा के भी कुचालक होते हैं।


 पर असल जानकारी तो अभी बाकि है। जो हमारे ऊन सभी सवालों के जवाब तो देगें ही पर साथ में विज्ञान के महत्व को भी दर्शायेगें। 



ऊष्मा के  चालक / सुचालक

   वे वस्तुएँ जो ऊष्मा का संंचार करती हैं उन्हें ऊष्मा की चालक / सुचालक कहते हैं।
जैसे : लोहा, ताँबा, स्टील, एल्युमीनियम  आदि ऊष्मा के सुचालक हैं। 

 इस प्रकार की वस्तुओं के अंदर के कण ऊष्मीय ऊर्जा को एक दूसरे तक पहुचाने में सक्षम होते हैं। क्योंकि सूचालक वस्तुओं के कण इतने पास - पास होते हैं कि जब किसी एक कण को ऊष्मीय ऊर्जा मिलती है तो दूसरा कण भी गर्म हो जाता है यानी एक कण से ऊष्मा दूसरे कण में शीघ्र ही चली जाती है। और इस  तरह से ऊष्मीय ऊर्जा का संचरण होता है। 





    सूचालक वस्तुओं के कणों के पास - पास होने की वजह से इनके घनत्व और भार दोनों ही ज्यादा होतें हैं। 
  इनमें ऊष्मीय ऊर्जा को सहने की क्षमता भी कुचालक वस्तुओं की तुलना में अधिक से अधिक होता है। ऊष्मा के साथ - साथ इनमें विद्युत ऊर्जा का भी संचरण होता है। 




  

   लोहे या किसी अन्य धातु पर लपेटा कागज जलाने पर क्यों नहीं जलता ? 

    हमने ऊपर यह पढ़ा है कि कुचालक वस्तुओं के कण अपनी ऊष्मीय ऊर्जा का आदान प्रदान करने में सक्षम नहीं होते हैं क्योंकि ये कण अपनी जगह से दूसरी जगह आ - जा नहीं पाते हैं जिसकी वजह से वस्तु के जिस भाग पर ऊष्मीय प्रभाव होता है वहीं का तापमान बढ़ता जाता है। और वस्तु जलने लगती है। पर जब इसी कागज को किसी मोमबत्ती या चिराग से जलाते हैं तो कागज के कण धातु ( लोहा, स्टील, ताँबा, ऐल्युमिनियम आदि ) के कण के सम्पर्क में आ जाते हैं और कागज के कण द्वारा सम्पूर्ण ऊष्मीय ऊर्जा को इतनी तेजी से संचरित करते हैं कि कागज का ताप ही नहीं बढ़ पाता है। इस तरह कागज जलने से बच जाता है। 



विशेष : अगर मोमबत्ती के स्थान पर कोई बड़ी लौ हो तो कागज लोहे या धातु के सम्पर्क में होने के बाद भी जल जाता है। क्योंकि कागज के कण बहुत अधिक मात्रा में ऊष्मा को इतनी तेजी से धातु के कणों तक पहुचाने में असमर्थ हो जाते हैं। 


   यहांँ पर एक बहुत अच्छा उदाहरण यह भी मिल रहा है कि अगर कोई बेवकूफ़ / कम बुद्धिमान मनुष्य किसी चालाक मनुष्य के संपर्क में रहता है तो उसकी भी चालाकी बढ़ जाती है जैसे कागज की कूचालकता लोहे या अन्य धातुओं के संपर्क में रहने से बढ़ जाती है। 





  तो उम्मीद आपको आपके सवाल का सही उत्तर मिल गया होगा। अगर आपके पास कोई सवाल या सुझाव है तो कमेंट करें। Thanks.. 


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13 Sep 2019

पक्षी या चिडिया झुंड में ही क्यों उड़ान भरते हैं ? वैज्ञानिक कारण by : Possibilityplus.in



 पक्षियों का झुंड में उड़ना, हमारे लिए जितना मनोरंजक लगता है उतना ही पेंचिदा यह लगता है कि यह ऐसे एक शानदार आकार में ही उड़ान क्यों भरते हैं। क्या इसके पीछे कोई कारण है ?
तो आप बिल्कुल सही है पर जवाब क्या है चलिए पढ़कर जानते हैं।



ये है Possibilityplus.in  साईट जहाँ आपको ऐसी जानकारियाँ पढ़ने को मिलती हैं जो आप चाहते हैं। अगर आपका कोई सवाल है तो हमें कमेेन्ट जरुर करें । धन्यवाद ! 




पक्षी झुंड में कब और क्यूँ उड़ते हैं ?  When and when the birds fly in   the flock ?





   पक्षि झुंड में तब उड़ान भरते हैं जब उन्हें अधिक दूरी तय करनी होती है। ऐसा क्यों यह सवाल उठना स्वाभाविक है। इसको जानने से पहले हमें यह भी जानना होगा कि यह आखिरकार इतनी अधिक दूरी तक क्यों करते हैं ?



इस सवाल का जवाब हम बड़ी आसानी से जान सकते हैं। जिस प्रकार से हम अपनी रोजी-रोटी के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक सफर करते हैं ठीक उसी प्रकार से ये पक्षियों का झुंड भी इधर-उधर अधिक दूरियाँ तय करता है । क्या हमें इतना पढ़ने के बाद यह महसूस हो रहा है कि हम पुरी तरह से यह जान चुके हैं कि असल वजह क्या थी ? 
तो आपका जवाब होगा नहीं, क्योंकि यह जानकारी अभी अधूरी है। 
             दरअसल पक्षियों का झुंड में उड़ने सबसे बड़ा और पहला का कारण यह है कि यह जल्दी थकते नहीं हैं और ज्यादा से ज्यादा दूरियाँ बिना रुके ही तय कर लेते हैं। इसके लिए वो अपनी स्थितियों को बदलते रहते हैं। झुंड में जो पक्षी सबसे पिछे है तो इसका मतलब यह है कि वह कम बल लगा रहा है और थोड़ा-सा थीमी गति से चल रहा है और थका हुआ है तथा जो पक्षी सबसे आगे है तो इसका मतलब यह है कि वह सबसे ज्यादा बल लगा रहा है और थकान से मुक्त है और अपने से पिछे वाले पक्षियों से थोड़ा तेज उड़ रहा है । पर कुछ दूरी तय करने के बाद सबसे आगे वाला पक्षी झुंड में सबसे पिछे चला जाता है और सबसे पिछे वाला सबसे आगे आ जाता है। इस तरह से पिछे के पक्षी कम बल लगाते हुए आराम से सभी पक्षियों के साथ - साथ अत्यधिक दूरियाँ तय करते हैं। 







पक्षी विशेष आकृति में ही क्यों उड़ान भरते हैं ? 

Why do birds fly in a special shape ?


    अब आती है बारी इनके विशेष आकृति के बारे में जानने की। हमें यह देखा होगा कि पक्षी 🐦 जब झुंड में उड़ते हैं तो वे हवाई जहाज के पंखों के जैसी आकृति बनाते हुए अधिकतर उड़ते हैं। इस प्रकार की आकृति  पर हवा का दबाव बहुत कम लगता है और पक्षियों के उड़ने में आसानी होती है।
     पर एक सवाल अभ भी यह उठता है कि आखिर पक्षियों को इसकी जानकारी कैसे पता है ?
दरअसल बात यह है कि पक्षियों को इसकी जानकारी नहीं होती है और जब वे झुंड में एकसाथ उड़ान भरते हैं और एकसाथ आगे बढ़ना चाहते पर जो पक्षी तेज और ऊर्जा से भरपूर होते हैं वे अधिक तेजी से उड़ते हैं पर जो इनसे कम तेज और कम ऊर्जावान होते हैं वे इतनी तेजी से ना उड़ पाने के कारण अपने आप ही पिछे खिसक जाते हैं।
इस तरह एक ऐसा आकार बन जाता है जिसकी इन्हें कोई जानकारी नहीं होती है। और हमें लगता है कि जैसे पक्षी यह सब सोंच समझकर ऐसा कर रहे हैं।





   जब पक्षियों की चाल अलग - अलग होती है तो वे एकसाथ कैसे आगे बढ़ पाते हैं ? 


   यह सवाल वैज्ञानिक के साथ जिज्ञासाओं वाला भी है। इसलिए  हमें इसके बारे में जानना चाहिए। इसको समझना भी आसान है। हम सभी यह बात भली भांति जानते हैं कि जब किन्हीं वस्तुओं की चाल में अन्तर है तो इसका मतलब यह है कि एक ही दूरी तय करने के लिए उन वस्तुओं को अलग - अलग समय भी लगेगा है। इस तरह से तो पक्षियों को एक ही स्थान पर जाने के लिए अलग - अलग समय में पहुँचेंगे। पर यहाँ पर तो पक्षियों का झुंड एकसाथ ही पहुते हैं ( उस  स्थान पर जहां वे जाना चाहते हैं )।
   हमने प्रायः सड़कों पर यह देखा होगा कि जब कोई तेज रफ्तार से जाती हुई गाड़ी किसी कागज या  हल्की वस्तु से होकर जाती है तो गाड़ी के खिचाव बल के कारण हल्की वस्तुएँ गाड़ी के पिछे खिंची चली जाती हैं। पर कुछ दूरी पर जाते - जाते रुक भी जाती हैं। जब ये हल्की वस्तुएँ बिना किसी गति के बाद भी गाड़ी के साथ कुछ दूरी तय करती हैं। अगर गाड़ी की गति या चाल से थोड़ा सा भी कम होती तो वस्तु की चाल या गति तो ये वस्तुएँ गाड़ी के साथ - साथ ही चली जाती ( गाड़ी की गति के सहारे ) ।




    यहाँ पर एक  बात यह भी स्पष्ट होती है कि जिसकी चाल कम होती है वह पिछे होती है और आगे वाली वस्तु की के बल से खिंची चली जाती हैं । जैसे इस उदाहरण में कम चाल वाली हल्कि वस्तुएँ गाड़ी के पिछे होती हैं। बिल्कुल इसी तरह से जिन पक्षियों की चाल कम होती है वे पिछे होते हैं और उन्हें कम बल और चाल से चलने से आराम मिलता है और एक साथ आगे बढ़ते जाते हैं। कुछ दूरी जाते-जाते जब आगे वाले पक्षियों की ऊर्जा और गति कम होती जाती है और वे अपने से पिछले से ही पिछे होते जाते हैं। और इस तरह से लगभग ^ आकार की आकृति बन जाती है इनके झुंड के कारण ।




  उम्मीद है कि आपको यह जानकर अब असल वजहों का पता चल गया होगा। अगर फिर भी कोई सवाल है तो कमेंट करें । धन्यवाद !  
By : Possibilityplus.in... 



12 Sep 2019

मात्रक कैसे पता करें किसी भी सूत्र का।


   इनके मात्रक बताओ :

  • वेग
  • चाल
  • त्वरण 
  • कार्य 
  • विद्युत धारा 
  • लम्बाई 
  • समय
  • क्षेत्रफल 
  • दाब 
  • बल





  इन सभी के मात्रक क्या हैं और कैसे इन्हें याद करना है इन सभी के बारे पुरी जानकारी 💡 दी गई है। यही नहीं बल्कि सभी व्युत्पन्न मात्रकों को याद करने की झंझट भी खत्म हो जायेगी। इन सभी सवालों को हमें जानने के पहले इनके बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ जानना परमावश्यक है। 





नोट : 
इस आर्टिकल को पढ़ने के बाद आपको कितना समझ में आया या फिर आपका कोई सवाल है तो कमेंट करें । धन्यवाद !


      विज्ञान हो या दैनिक जीवन हमें मात्रक का उपयोग करना ही पड़ता है। किसी वस्तु की सही मात्रा को बताने के लिए मात्रकों का उपयोग किया जाता है। किसी भी राशि का मान बताने के लिए हमें दो पदों की आवश्यकता होती है :
  1. राशि का संख्यात्मक मान (Numerical value) 
  2. मापन का मात्रक (Unit of measurement) 

उदाहरण : 2 मीटर, 5 किलोग्राम, 10 सेकण्ड, 15 जूल इन राशियों का आंकिक या संख्यात्मक मान 2, 5, 10, और 15 हैं और इनके मात्रक मीटर, किलोग्राम , सेकण्ड और जूल हैं। चलिए जीवंत उदाहरण देखते हैं। 
     
जैसे मान लिजिए : हमें 5 किलो  चीनी लेना है तो हमें " पाँच किलो " चाहिए या दो ऐसा दूकानदार से कहना पड़ेगा। तभी तो दूकानदार को यह पता चलेगा कि कितना सामान या चीनी चाहिए। अगर हम दूकानदार से यह कहें कि हमें पाँच चीनी दो या चाहिए तो इसका अर्थ यह होगा कि हमें चीनी के पाँच टुकड़े चाहिए। तो देखा आपने मात्रक का कितना महत्वपूर्ण स्थान होता है हमारे दैनिक जीवन में।









मूल राशियाँ तथा मूल मात्रक  Fundamental Quantities & Fundamental Units. 



    विज्ञान विषय को सरलता से समझने और याद करने की दृष्टि से विज्ञान में कुछ प्रचलित या बहुदा उपयोग में आने वाली राशियों को मूल राशि के रूप में स्वीकार किया गया है। ये सात प्रकार की हैं :

  1. लम्बाई या दूरी 
  2. द्रव्यमान 
  3. समय 
  4. ताप
  5. विद्युत - धारा 
  6. ज्योति तिव्रता तथा 
  7. पदार्थ की आण्विक मात्रा ( molecular quantity ) 


तो ये थी सात मूल राशियाँ । अब जानते हैं मूल मात्रकों के बारे में। 

मूल मात्रक की परिभाषा : वे मात्रक जिनका अलग - अलग स्वतंत्र रूप से निर्धारण किया जाये और जो किसी अन्य मात्रकों पर निर्भर ना हों मूल मात्रक कहलाते हैं। 


व्युत्पन्न मात्रक ( derived unit )  :  जो मात्रक एक से अधिक मूल मात्रकों से मिलकर बन होते हैं उन्हें व्युत्पन्न मात्रक कहते हैं।
जैसे : चाल = दूरी / समय
में दो मूल मात्रक मीटर / सेकंड है।




मात्रक पता करने का तरीका 

( Way to find unit ) 


    निम्न राशियों का मात्रक लिखिए :

  • वेग
  • चाल
  • त्वरण 
  • कार्य 
  • विद्युत धारा 
  • लम्बाई 
  • समय
  • क्षेत्रफल 
  • दाब 
  • बल


    वेग = विस्थापन / समय = मीटर / सेकण्ड
 विस्थापन दो  बिंदुओं के बीच की दूरी होता है। और दूरी का मूल मात्रक मीटर होता है। समय का मात्रक सेकण्ड होता है।चुँकि वेग का  का कोई मूल मात्रक नहीं होता है। इसलिए हम यहाँ पर विस्थापन और समय के मात्रक को ही उपयोग में लाते हैं। अगर इसका भी कोई मूल मात्रक तय किया जाये तो उसे भी याद करना होगा जो कि विज्ञान को और भी कठिन बना देगा। इसीलिए कुछ ही राशियों को मूल मात्रक बना दिया गया है। निचे सारिणी में मूूल राशियाँ और उनके मूल मात्रक दिए गए हैं। जिनकी मदत से हम इनमें से किसी भी राशि का मात्रक पता कर सकते हैं।
 इसी तरह चाल का मात्रक भी मीटर / सेकण्ड होता है।
त्वरण का मात्रक क्या होता है। इसको जानने के लिए इसका सूत्र हमें पता होना चाहिए।
त्वरण = वेग - परिवर्तन / समय
होता है। चुँकि वेग का मात्रक = मीटर / सेकण्ड होता है और समय का सेकण्ड होता है। इसलिए त्वरण का मात्रक = ( मीटर / सेकण्ड ) / सेकण्ड
         = मीटर / सेकण्ड 2
हो जाता है। सेकण्ड का सेकण्ड में गुणा होने की वजह से यह  सेकण्ड 2  हो जाता है।

   



मूल राशियाँ प्रतीक मूल मात्रक प्रतीक
लम्बाई L मीटर मी ( m )
द्रव्यमान M किलोग्राम किग्रा ( kg )
समय T सेकण्ड से( s )
ताप थीटा केल्विन या डिग्री सेल्सियस K या °C
विद्युत धारा A ऐम्पियर ए ( A )
ज्योति तीव्रता I कैण्डिला कै ( cd )
पदार्थ की आण्विक मात्रा Q मोल ( mole ) मोल ( mole )
 

31 Aug 2019

असफलता से सफलता पाने का अचूक मोटिव , by : Possibilityplus.in




                   ये पोस्ट असफलता से सफलता  पाने की ऐसी संभावना ( Possibility ) और ऊर्जा से भरपूर है जिससे हमें असफलता मिलने का भी डर नहीं रहेगा क्योंकि असफलता ही हमें सफलता का पथ प्रदर्शित करेगी।
 निचे दिए गए बिन्दुुओं को देखिए - 


  • असफलता ही सफलता का मार्ग दिखाती है।
  • असफलता ही सफलता का महत्व बताती है। 
  • असफलता की भी एक सीमा होती है। 
  • जितनी अधिक बार असफलता मिलती है सफलता मिलने की संभावना उतनी ही ज्यादा होती है।
  • असफल होना गलत नहीं है बल्कि असफलता के डर से प्रयास न करना गलत है।
  • असफलता और सफलता हमारे मन की उपज है।





 विशेेष : दुनियाँ का बड़े से बड़ा काम ही क्यों न हो और असफलता चाहे कितनी भी ज्यादा क्यों न मिली हो मगर उसमें सफलता की आखिरी उम्मीद कभी नहीं समाप्त होती है। अगर समाप्त होती है तो वह है हमारा प्रयास। 💎


   उपर्युक्त बिन्दुओं को देखते हुए यह पता चलता है कि असफलता और सफलता के बीच  एक गहरा संंबंध है। बल्कि यह कहना उचित होगा कि असफलता और सफलता दोनों ही एक ही  सिक्के के दो पहलू हैं। इसका मतलब यह है कि जहां असफलता होती है वहां पर सफलता का होना भी तय / निश्चित है। हम जानते हैं कि असफलता और सफलता दोनों  एक-दूसरे के विपरित हैं। शब्द असफलता से भी एक बहुुुत अच्छा उदाहरण निकलकर आता है और वह यह है कि इसका ( असफलता ) पहला अक्षर हटाने पर सफलता में बदल जाता है। याानी इससे यह स्पष्ट होता है कि असफलता में भी सफलता छिपी हुई है बस उसमें सुधार करने की जरूरत होती है।
 उपर्युक्त बिन्दुओं को सविस्तार से जानते हैं।









असफलता ही सफलता का मार्ग दिखाती है...

      दुनियाँ में असफलता को बहुत लोग या तो गलत मानते हैं या फिर असफलता पाना ही नहीं चाहते हैं। किसी भी काम में अगर हम असफल हो रहेें तो इसका मतलब यह है कि हमने जो तरिका अपनाया था सफल होने का नहीं बल्कि असफल होने का था। जिससे हमेें उसी काम को किसी अन्य तरिके से करने का विचार आता है। यहाँ से यह स्पष्ट होती है कि असफलता हमें  सफलता का मार्ग दिखाती है। हम किसी भी काम में जितना अधिक से अधिक बार असफल होते हैं तो हमें उसी काम में सफल होने की संभावना उतनी ही ज्यादा होती चली जाती है। एक स्ति्थि ऐसी आयेगी जब असफलता की संभावना ही समाप्त हो जायेगी और तभी असफलता भी हमारे आगे घुटने टेककर यह कहेगी कि अब तुम्हें असफल करने के लिए मेरे पास कोई प्रभावी संभावना ही नहीं बची है। अतः अब तुम सफलता प्राप्त कर सकते हो। इसे और बखूबी समझने के लिए हमें कोई जीवंत उदाहरण लेना चाहिए।


  1. थामस एल्वा एडिसन  :  एडिसन एक ऐसे वैज्ञानिक थे जिन्होंने इस दुनियाँ को असफलता का मतलब अपने शब्दों में इस तरह बयाँ  किया " मैं बैट्री बनाने में सैकड़ों बार असफल हुआ मगर इससे भी मुझे यह सीख मिली कि इन सभी तरिकों से बैट्री नहीं बनाई जा सकती है जो तरिके मैने अपनाये थे। "    एडिसन को बल्ब 💡का आविष्कार करने के लिए  दस हज़ार से भी ज्यादा बार असफलता मिली। पर वे जानते थे कि वह असफलता की सीढियाँ बनाकर सफलता को पा सकते हैं। एडिसन हर असफलता से कुछ न कुछ जरूर सीखते थे।   उन्हें यह अच्छी तरह से पता चल चुका था कि ये सारी असफलताएँ व्यर्थ नहीं हैं और आखिकार बल्ब 💡का आविष्कार करने में उन्हें सफलता मिल ही गई। मतलब गलती भी हमें सफलता के पथ को प्रदर्शित करती है यह बात तो स्पष्ट है। यहाँ पर एक बहुत जानदार और मोटिव वाला यह निष्कर्ष भी निकलकर सामने आता है कि असफलता चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो पर उसमे हमें सफलता की एक झलक अनिवार्यरूप से देखने को मिल ही जायेगी।  इसी को ही आखिरी उम्मीद  का नाम दिया गया है।  
  2. चींटी : चीटियों को हमने किसी ऊँचे स्थान पर चढ़ते हुए जरुर देखा होगा। ये उँचे स्थान पर चढ़ने के लिए ना जाने कितने ही प्रयास करती हैं। भले ही ये बार - बार असफल होती हैं मगर फिर भी चढ़ने का सिलसिला जारी रहताा है। ये चढ़ने के लिए इतनी ज्यादा कोशिश करती हैं कि इनके सफल होने की संभावना ही बढ़ जाती है और अन्त में वह उस उँचे स्थान पर चढ़ ही जाती हैं। 






  इस तरह से मिलने वाली सफलता का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान होता है 

   



असफलता की सीमा 

     

    दुनियाँ में लगभग हर वस्तु की या कार्य के होने की कोई न कोई सीमा जरुर होती है। तो जाहिर सी बात है कि असफलता की भी कोई न कोई सीमा जरुर होनी चाहिए जो सफलता पर जाकर समाप्त होती हो । जब हम असफलता की सारी संभावनाओं को अपने प्रयासों से समाप्त करते हैं तो हम सफलता और असफलता की सीमा पर पहुंच जाते हैं जहाँ से हम कहीं भी जा सकते हैं चाहे सफलता हो या असफलता। इसके बाद हम सफलता की ओर बढ़ सकते हैं क्योंकि हमारे पास अब असफल होने की कोई प्रभावी संभावना नहीं है। 
      इस बिन्दु पर ना तो सफलता मिलती और ना ही असफलता। इसे उदासीन बिन्दु भी कहते हैं। इसी बिन्दु पर वो लोग रहते हैं जो जितना सफल होते हैं वो उतना ही असफल भी होते हैं। इसे ऐसे समझिए अगर कोई व्यक्ति 500 रूपये कमाता है और वह इसमें से कुछ भी ना बचाते हुए सारा पैसा खर्च कर देता है। यानी वह कमाने से पहले जहाँ था वहीं खर्च करने के बाद फिर आ जाता है। 




असफल होना गलत नहीं बल्कि असफलता के डर से प्रयास न करना गलत है..


    यह लाईन भी बहुत प्रेरणादायी है और हमें इसे अपने दैनिक जीवन में अनिवार्यरूप से उपयोग में लाना चाहिए। इस बात को पढ़ने से ही हमें मोटिव(प्रेरणा)  मिलती है। तो सोचो इसे करने में कितना मोटिव और कामयाबी मिलेगी। यह सफलता की कुंजी है जो हमें यह बताता है कि असफल होना गलत नहीं है बल्कि इसके डर से कि  मैं दोबारा - तेबारा या बार - बार असफल हो जाउँगा तो क्या मतलब ऐसे प्रयास का और यही हमारी सबसे बड़ी गलती साबित हो सकती है जो हमें किसी भी काम में सफलता नहीं दिला पायेगी।




  यदि यही गलती करते हुए एडिसन ने अपने प्रयासों को बंद कर दिया होता तो आज उन्हें शायद कोई नहीं जानता होता। इसी तरह अगर चींटी भी बार - बार प्रयास न करती तो वह भी शायद कभी किसी उँचे स्थानों पर नहीं चढ़ पाती और हम सब चींटियों का बखान नहीं करते। 
  ऐसे तमाम किस्से भरें पढ़ें हैं जो इसकी पुष्टि करते हैं कि " असफल होना गलत नहीं बल्कि असफलता के डर प्रयास न करना गलत है। "



पुरा आर्टिकल पढने के बाद असफलता और सफलता की ये बातें सामने आ रही हैं -

  1. सफलता का मार्ग असफलता से होकर ही जाता है। 
  2. बिना असफलता के कोई भी सफलता नहीं मिलती। 
  3. हम असफलता के कारण असफल नहीं होते बल्कि प्रयास न करने से असफल होते हैं।
  4. प्रयास ही सफलता का मुख्य मोटिव है। 


             यह आर्टिकल पढ़ने के बाद आपको मोटिव ( प्रेरणा) मिला या नहीं, कमेंट जरूर दें।
Thanks for Reading. 
By : Possibilityplus.in


24 Aug 2019

सपने में कैसे पता करें कि हम सपने में हैं, क्या है सपने का राज , सिर्फ Possibilityplus.in पर..





  • क्या आप सपने देखते समय यह जानते हैं कि आप सपने में हो ?
  • क्या हम सपने में कहीं भी उड़ते हुए जा सकते हैं ? 
  • क्या हम अपने अनुसार सपने देख सकते हैं ? 
  • क्या सपने से कोई जानकारी हासिल की जा सकती है ? 


तो जानने के लिए हमें यह आर्टिकल पुरी तरह से पढ़ना होगा और पढ़ने के बा..द  आप यह आर्टिकल अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करें। 


यह जानकारी हमारे शूक्ष्म शरीर यानी आत्मा से संबंधित है। 
 शरीर से आत्मा दो स्थितियों में निकलती है - 

  1. गहरी नींद में और
  2. दूसरे मरने पर। 
पर इन स्थितियों में बहुत बड़ा फर्क होता है। सपने में आत्मा स्वेच्छा से किसी काम आदि के लिए निकलती है पर जब शरीर इसकदर बेकार हो जाती है कि आत्मा का निवास स्थान भी रहने लायक न रह जाये तो आत्मा को ना चाहते हुए भी शरीर से निकलना पड़ता है। 

हम यह जानकारी www.possibilityplus.in पर पढ़ रहे हैं।

    क्या हम सपने मनचाहे जगह जा सकते, उड़ सकते हैं, या कोई भी जानकारी पता कर सकते हैं तो कैसे इन सभी सवालों को आप उत्तर से भगा पाओगे। तो चलिए पढ़ते ये आर्टिकल।

   आत्मा शरीर की जान होती है। इसके बिना हमारा शरीर मृत समान हो जाता है। अपनी जिंदगी में लगभग हर व्यक्ति कभी न कभी यह महसूस किया होगा कि अचानक निंद टूट जाती है और हमारा शरीर हीलता - डोलता नहीं है। यह वह स्थिति है जब हमारी आत्मा हमारे शरीर में नहीं होती है पर हमें यह जानकारी होती है कि हम जाग चुके हैं। ऐसे समय में हमें झुनझुनी महसूस होती है। 
कुछ लोग इसी क्रिया को भूत 💀 या सैतान द्वारा पकड़े जाने की बात कहते हैं पर यह गलत है। चलिए अब उस सवाल की तरफ बड़ते हैं। 




  शरीर से आत्मा कब, कैसे और क्यों निकलती है ?  

       दरअसल  हमारे शरीर से आत्मा हर रात या दिन को गहरी नींद में होने पर निकलती है। आखिर क्या कारण है कि ये गहरी नींद में शरीर से बाहर निकल जाती है।



      दरअसल जब हम जाग रहे होते हैं तो हमारा मन और मस्तिष्क चलता या काम करता है। जागने के दौरान हमारे मन में जो भी बातें होती हैं। वह चलती रहती है जबतक वह पुरा ना हो जाए। जागते समय हमारे दिमाग में बहुत सारे अनचाहे या बिना सोचे काम चलते या होतें हैं, जैसे - चलना, बोलना, सोचना या कोई काम करना। इन सभी कामों में हमारे मन और मस्तिष्क की शक्ति बँट जाती है । पर जब हम गहरी नींद में सो रहे होते हैंं रैखिक तो हमारी इच्छाओं का रेला ही रहता है और हमारी बड़ी शारीरिक क्रियाएँ बंद या रुक जाती जैसे - सोचना, हिलना - डोलना आदि। इस वजह से हमारी सारी ऊर्जा हमारे शूक्ष्म शरीर यानी आत्मा को मिल जाती है। इस वजह से हमारी आत्मा की ऊर्जा बड़ जाती है और वह कहीं भी आ या जा सकने में सक्षम हो जाती है। इस दौरान जो ईच्छा सबसे ज्यादा होती है वैसा ही स्वप्न ( सपना ) हमें दिखाई देता है।


यहाँ पर एक रोचक बात यह है कि हमारी आत्मा कहीं भी आ या जा सकती है और हमारी शरीर से संबंधित रहती है। चाहे यह शरीर से कितनी ही दूर क्यों न हो पर हमें आत्मा द्वारा देखे गये सभी दृश्य स्पष्ट दिखाई देता है। यह कैसे होता है ?
   इसका सबसे अच्छा उदाहरण मोबाईल है। हमारा मोबाईल हमारे पास रहते हुए भी दुनिया के किसी भी कोने में मौजूद दृश्य को दिखा देता है जब वह किसी अन्य मोबाईल से आनलाइन संबंधित होता है। दरअसल दूसरे वाले मोबाइल से संबंधित होने के कारण उसकी बहुत सारी गतिविधियाँ देखी जा सकती है। इसी तरह हमारी आत्मा जिसे शूक्ष्म शरीर भी कहते हैं यह जो भी देखती या करती है वह सभ हमें दिखाई देता है।
   तो इस तरह शरीर से आत्मा बाहर निकल जाती है। 





सपने में जो मन चाहे करना..


        क्या आपने यह कभी सोचा है कि हम सभी अपने सपने जो चाहे वह कर सकते हैं। ( इसका मतलब इससे मत लगाना की हम किसी की कोई वस्तु ले सकते हैं जो हमारी वास्तविक दुनियाँ में है बल्कि इसका यह मतलब यह है कि हम सिर्फ जानकारी ले सकते हैं जो चाहते हैं पर कोई वस्तु नहीं ) यही कारण है कि ऋषि और मुनी अपनी सभी शारीरिक क्रियाएँ कम कर अपनी आत्मा को कहीं भी ले जाते थे। और अपनी जो भी इच्छा सबसे ज्यादा होती थी उसे पुरा करने के लिए ध्यान करते थे और सम्बन्धित जाानकारी प्राप्त करतेे थे। यही नहीं जिस तरह से एक मोबाईल को दूसरे मोबाईल को कनेक्ट करते हैं चाहे इनके बीच कितनी ही दूरी क्यों ना हो। बिल्कुल इसी तरह से ऋषि मुनि अपनेआप को भी भगवान से कनेक्ट करके वार्ततालाप करते थे। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि हम ऐसा करेंगे कैैसे क्योंकि जब हम सपने देखते हैं तो हमें यह भी नहीं पता  होता है कि हम सपने में हैं। हमें यह सब सच लगता है। पर एक बात हम मिस ( छोड़ना ) कर रहे हैं और वह यह है कि ऋषि मुनि लोग ऐसा तब करते थे जब वह सो नहीं रहे थे बल्कि ध्यान में होतेे थे। इसकेे लिए वह किसी एकान्त स्थाान पर जहाँ शाांति हो ऐसा स्थान ढूढते थे।
   अब आपके मन यह सवाल उठ रहा होगा कि हम कैसे ऐसा करें ? है ना तो इस बात को जानने से पहले हमें ऊपर दिए गए उदाहरणों को समझना बहुत जरूरी था इसलिए इन्हें शामिल किया गया है। चलिए हम सब कब, कैसे यह कर सकते हैं पढ़कर जानते हैं।





     ऐसा करने के लिए ये निम्नलिखित बातें आवश्यक हैं - 
  1. सपने में मनचाही बातें जैसे - उड़ना, कहीं पर जाने आदि के लिए सुबह 3 - 4 बजे जागना होगा। 
  2. जागने के बाद हमें जो भी काम सबसे ज्यादा पसंद हो उसके बारे में सोचते हुए फिर से सोना है। 
  3. इसके बाद हमारा शरीर धिरे - धिरे हमें महसूस होना बंद और झुनझुनी ( जैसे जागते समय हाथों और पैरों में होती है ) शुरू होने लगता है। 
  4. अब अगर हम उड़ाना या कहीं जाना चाहते हैं तो इसी समय कर सकते हैं। बस सोचना होगा और वैसा होने लगेगा। और यह सब आपको एकदम सचका अहसास दिलाएगा। 
  5. ऐसा करते समय आपको एकदम फ्री मतलब आपको कोई disturbe ना करें। यह बात बहुत जरूरी है। ज




    ऐसा करने के बाद आप अपने अनुभव हमसे जरूर शेयर करें। हमें बड़ी खुशी होगी। और साथ साथ 

आपको यह पोस्ट / आर्टिकल कैसा लगा जरुर शेयर करें। धन्यवाद... by : Possibilityplus.in



13 Aug 2019

ऊष्मा संचरण / प्रकाश की यह जानकारी नहीं जानते होंगे !




  • क्या प्रकाश को रोका जा सकता है ? 
  • क्या प्रकाश की चाल बदलती है ? 
  • प्रकाश कितने रंगों से मिलकर बना है ? 
  • प्रकाश की चाल की कितनी होती है ? 







     ऊष्मा संचरण की तीन विधियाँ होती हैं -

  1. चालन
  2. संवहन 
  3. विकिरण 




    क्या हम जाानते हैं कि इन तीनों विधियों में वह कौन - सी मुुख्य वजह है जिसका होना अनिवार्य है। इसका मतलब यह है कि बिना इसके ऊष्मीय ऊर्जा का संचार होना संभव नहीं है। तापान्तर ही वह मुख्य वजह है जिसके कारण ऊष्मा का संंचार या आदान-प्रदान होता है। 
              यह पोस्ट ज्ञान की दृष्टि से बड़ा महत्वपूर्ण है। सबसे पहले हम ऊपर दी गई तीनों विधियों की पुरी जानकारी ले लेते हैं। 




       परिभाषाएँ   

   चालन ( Conduction )

          यदि किसी वस्तु में एक स्थान का ताप 🔥 अधिक और उसी वस्तु के दूसरे स्थान का ताप 🔥 कम है तो अधिक ताप वाले कण के नजदीक कम ताप वाले कण की तरफ ऊष्मीय ऊर्जा  प्रवाहित या संचरित होती है।






   संवहन (  Convection ) 

             किसी तरल पदार्थों ( द्रव और गैस ) में यदि किसी स्थान का ताप अधिक हो तो घनत्व में कमी हो जाने से तरल ऊपर उठता है और कम ताप ( अधिक घनत्व ) का तरल उसका स्थान ले लेता है। यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कि सम्पूर्ण तरल एक ही ताप पर न हो जाए। इस क्रिया में तरल  पदार्थ के कण स्वयं स्थानांतरित होकर ऊष्मा का संचरण करते हैं। 








 विकिरण (Radiation)  

              अधिक ताप की वस्तुओं से कम ताप की वस्तुओं को विधुत - चुम्बकीय तरंगों के रूप में ऊष्मा स्थानांतरित होती है। इन विकिरणों की प्रकृति प्रकाश की प्रकृति से मिलती - जुलती है। इन्हें अवरक्त विकिरण भी कहते हैं। इनके संचरण के लिए किसी पदार्थ माध्यम की आवश्यकता नहीं होती है।

उदाहरण : जैसे सूर्य से पृथ्वी तक  ऊष्मा, ऊष्मीय विकिरण द्वारा ही पहुँचती है।
पर  विकिरण ऊष्मा संचरण का एक ऐसा तरीका है जो वातावरण में मौजूद अतिसूक्ष्म कणों के द्वारा संचरित होती है। अब आप शायद यह सोच रहे होंगे कि विकिरण के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती है तो माध्यम और कण कहाँ से आ गया। चुँकि हमने पोस्ट के शुरूआत में यह पढ़ा था कि ऊष्मा संचरण के लिए तापान्तर की आवश्यकता अनिवार्य होता है। जिसके लिए कोई भी माध्यम तो चाहिए ही जो ऊष्मा को एक स्थान से दूसरे स्थान तक लेकर जाये। वायुमंडल ( हवा ) ऐसे ना जाने कितने ही कण हैं जो हमें दिखाई भी नहीं देतेे हैैं।
जैसे  : हमारी आवाज 🔉 भी वातावरण में मौजूद शूक्ष्म कणों द्वारा ही होती है, मोबाइल का सिग्नल भी वायु मे उपस्थित कणों द्वारा ही होती है । चलिए कुुछ रोचक और मजेदार जानकारियाँ देखते हैं, जो हमें किताबों में भी शायद ही पढ़ने को मिले।




प्रकाश को कैसे रोकें ? 

How to stop the light ?


सूर्य ही नहीं बल्कि किसी भी वस्तु के प्रकाश को रोका या मोड़ा जा सकता है।
          सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी 14 करोड़ 50 लाख किलोमीटर है। अब क्या यह possibility( संभावना ) है कि बिना किसी माध्यम के प्रकाशीय ऊर्जा पृथ्वी तक पहुंच सके। हमने ऊपर 👆 पढ़ा है कि ऊष्मीय ऊर्जा बिना अन्तर के एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं पहुंच सकती है। इसलिए प्रकाश को सूर्य से पृथ्वी तक आने में या जाने के लिए इनके ( सूर्य और पृथ्वी ) बीच  ऊष्मीय ऊर्जा में अन्तर अनिवार्य है, परन्तु ऐसा नहीं है क्योंकि प्रकाश ऊष्मा संचरण का वह प्राथमिक तरिका है जो रंगों के आधार पर इसकी गति निर्धारित होती है ।  दरअसल प्रकाश के रंग और ऊष्मा में गहरा संबंध होता है। जैसा रंग वैसी ऊष्मा होती है। इन सातों प्रकाशीय रंगों में सबसे कम ऊष्मा लाल रंग की और सबसे ज्यादा ऊष्मा बैगनी रंग की होती है। यही कारण है कि ये सभी सातों प्रकाशीय रंग लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला और बैगनी  को इस क्रम में रखा या लिखा जाता है। 
इस तरह श्वेत (सफेद) प्रकाश की ऊष्मा इन सभी सातों रंगों से अधिक होती है या इन सभी के योग के लगभग बराबर होती है। क्योंकि हम जाानते हैं कि इन सातों प्रकाशीय रंगों से मिलकर ही श्वेत प्रकाश बना है। 
दरअसल ऊष्मा को प्रकाशीय रंगों में परिवर्तित होने का गुण है। इसी कारण से सूर्य की ऊष्मा बीच में कहीं क्षय नहीं होती है और इसकी चाल तीव्र ( 3 × 108 मीटर / सेेकंड ) होती है।

 इसका मतलब यह कि अगर सूर्य के प्रकाश (श्वेत प्रकाश) को रोकना है तो हमें इसके मार्ग में कोई श्वेत (सफेद) वस्तु रखें तो प्रकाश रुक जायेगा जी हाँ रुकेगा ही नहीं बल्कि वापिस चला जायेगा । प्रकाश के वापिस जाने की दिशा वस्तु पर प्रकाशीय कोण  पर निर्भर करता है। या अगर सूर्य के प्रकाश के मार्ग में सूूर्य के जितना सफेद प्रकाश ठीक उसके सीध में फोकस करेें तो सूर्य का प्रकाश आगे नहीं बढ़ सकता है। अगर प्रकाश के पथ में कोई काले रंग की वस्तु को रखें तो प्रकाश की प्रकाशीय गति और ऊष्मीय ऊर्जा वस्तु में ऊष्मा में परिवर्तित हो जाती है ।




पारदर्शी या रंगहीन माध्यम में प्रकाश की चाल 


  पारदर्शी माध्यम में प्रकाश की चाल लगभग समान होती है। ऐसा क्यों होता है ? 
हमने ऊपर पढ़ा है कि प्रकाश का संचरण रंगों पर आधारित है। इसलिए जब प्रकाश किसी पारदर्शी या रंगहीन वस्तुओं / माध्यमों में से होकर गुजरता है तो वह वस्तु या माध्यम गर्म नहीं होता है। और हमें वस्तु के आरपार दिखाई देता है। 





वस्तुओं के रंग (Color of objects) 

  किसी वस्तु के रंग की जानकारी प्रकाशीय ऊर्जा या प्रकाशीय रंग  के परावर्तन से पता चलता है। वस्तु जिस रंग की होती है ठीक उसी रंग के प्रकाश को परावर्तित करती ( वापिस भेजती ) है और बाकि सभी रंगों को अवशोषित ( रोक या ग्रहण कर ) लेती है। और यही परावर्तित रंग हमारी आँखों में पड़ता है तो हमें उस रंग की जानकारी मिल जाती है।




   ऊष्मा और प्रकाश में निम्नलिखित अंतर सामने आते हैैं -

  •  सूर्य के प्रकाश और ऊष्मा के मार्ग में यदि कोई इससे अधिक ऊष्मीय ऊर्जा हो तो सूर्य का प्रकाश इससे होकर जा सकता है, पर ऊष्मा नहीं जा सकती है। 
  • प्रकाश के संचरण लिए ऊष्मीय अन्तर नहीं बल्कि रंग का अंतर जरूर है जबकि ऊष्मा संचरण के लिए ऊष्मा में अन्तर होना चाहिए। 
  • विकिरण ऊष्मीय ऊर्जा  की चाल प्रकाश की चाल   3 × 108 मीटर / सेेकंड  के बराबर है। 
  •  प्रकाश की चाल ठंडे या अधिक घनत्व वाले माध्यम में कम होती है ( जैसे : जल में ) जबकि ऊष्मा की चाल ठंडे माध्यम में अधिक और गर्म माध्यम में कम होती है। 






व्यवहारिक जीवन में उपयोग। 

Use in practical life. 


  1. रात्री या अन्धेरे में मोबाइल या टीवी देखते समय हमें कोई लाईट या बल्ब 💡 जलाकर रखना चाहिए जिससे कि मोबाइल या टीवी से निकलने वाली रोशनी आँखों में ना लगे। 
  2. रात्री को सोते समय भी कोई ( हल्का ) उजाला जरूर रहने दें जिससे शरीर की ऊष्मीय ऊर्जा बनी रहे ( ठंडी के मौसम में ) । 
  3. रात्री में सोते समय यदि लाईट को बंद करें तो गर्मी थोड़ी कम  लगती है। 







  अगर हम रात के अंधेरे या दिन में भी किसी अंधेरे में मोबाइल का इस्तेमाल अधिक से अधिक करते हैं तो मोबाइल की स्क्रिन से निकलने वाला प्रकाश आपकी आंखों पर लोड डालेगा और इसमें उपस्थित ऊष्मीय ऊर्जा आंखों को गर्म कर देगी । इस तरह सरदर्द और फिर आंखों में समस्या का होना शुरू हो जायेगा।
  अगर यह मोबाईल या टीवी का इस्तेमाल हम कुछ उजाले में करते हैं तो बहुत हद तक हम इन परेशानियों से छुटकारा पा सकतें हैं।




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