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संभावनाओं का सागर

10 Nov 2019

सूर्य लाल क्यों होता है ? सुबह और शाम को । full details in hindi by Possibilityplus.in ।


सूर्य लाल क्यों होता है ? ( सूर्योदय और सूर्यास्त के समय )



   सूर्य का लाल रंग में ( सूर्योदय और सूर्यास्त के समय में ) दिखना एक प्राकृतिक घटना है जिसे हम वैज्ञानिक तर्क के आधार पर समझेंगे। उससे पहले लोगों की राय इसके बारे में क्या है उसे जान लेते हैं।



 बहुतों का कहना है कि सूर्य लाल इसलिए दिखाई देता है क्योंकि लाल, नारंगी और पीले रंग के अलावा बाकी सभी ( हरा, आसमानी, नीला और बैगनी ) रंगों का प्रक्रिणन हो जाता है। प्रक्रिणन क्यों होता है ? इसके जवाब में उनका कहना है कि वातावरण में मौजूद शूक्ष्म कणों ( धूल, गैस आदि ) के द्वारा  अत्यधिक आवृत्ति या कम तरंगदर्ध्यों वाली प्रकाश तरंगों का प्रक्रिणन या फैलाव हो जाता है। अतः हमें सूर्य लगभग लाल रंग का दिखाई देता है। 
   


नोट : अगर आप यह जानना चाहते हैं कि सुबह और शाम को सूर्य बड़ा तथा दोपहर को छोटा क्यों दिखाई देता है तो कमेंट करें। धन्यवाद ! 




  क्या यह कारण या उदाहरण हमारे मन को संतुष्ट करता है या यह हमें पुरी तरह से समझ में आया ? 
  अधिकांश लोगों का जवाब होगा " ना "  और कुछ लोगों का जवाब " हाँ "  में भी होगा।

चलिए अब ऐसे सवालों को देखते हैंं जो इस उदाहरण पर प्रश्न खड़ा करते हैं -

  • प्रक्रिणन सुबह और शाम में ही क्यों होता है ? 
  • प्रक्रिणन दोपहर में क्यों नहीं होता है जबकि वातावरण में वही धूल कण होते हैं। 
  • एकही समय में पृथ्वी के अलग - अलग स्थानों पर सुबह / शाम तथा दोपहर होते हैं तो प्रक्रिणन सिर्फ  सुबह और शाम वाले स्थानों पर ही क्यों होता है ? 


   इन प्रश्नों से यह स्पष्ट होता है कि बात अगर प्रक्रिणन की होती तो एकही समय में पृथ्वी के हर स्थानों पर प्रक्रिणन समान रूप से होना चाहिए। मगर उपर के उदाहरणों के हिसाब से अलग - अलग हो रहा है जो की गलत है। जब शुबह की पहली और शाम की आखिरी किरण पड़ती है तो प्रक्रिणन होता है मान लेते हैं पर हर अगले सेकेंड सूर्य का रंग बदलता जाता है तो क्या प्रक्रिणन समाप्त होने लगता है ?
इसको समझने के लिए हम आगे बढ़ते हैं।

  


सूर्य का लाल होना




          हमारी पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है और इसी वजह से रात और दिन होते हैं। घुमती हुई पृथ्वी का कोई भी भाग जब सूर्य की तरफ जाता है तो पृथ्वी के उस भाग पर सूर्य की किरणें पड़ने लगती है और वहाँ पर सबेरा होता है। इसके बाद दोपहर और  शाम होने लगती है । 
        सूर्य का प्रकाश सात रंगों से मिलकर बना है। और निचे दिए गए चित्र के अनुसार प्रकाश किरणें चलती हैं। 


ऊपर दिए गए चित्र से यह स्पष्ट हो रहा है कि अगर हम सूर्य के समान्तर या चित्रानुसार तीर के समान्तर देखें तो हमें सूर्य की लाल किरण ही दिखाई देती है और ऐसा ठीक सुबह या शाम के समय हो सकता है। सुबह और शाम के समय सूर्य और इसकी किरणें पृथ्वी और हमारी आँखों के समान्तर होती हैं । 


 ये श्वेत प्रकाश के रूप में तब तक दिखाई देेता है जबतक सातों प्रकाशीय रंग एक दूसरे के बिल्कुल पिछे होते  या एक सीध में हों और इन्हें देेखा जाए। 



 इनमें सबसे आगेे लाल और सबसे पिछे बैगनी रंग का प्रकाश होता है। सुबह के समय प्रकाश ( पृृथ्वी के  उस भाग पर जहाँँ सुबह होने वाली होती है ) पर पृृथ्वी के समान्तर ( लगभग 0° कोण पर ) पड़ता है और हमारी आँखों में लाल किरण ही पड़ती है ( एकदम शुरू में )  और बाकि नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला और बैगनी रंग  हमारी आँखों तथा पृथ्वी पर पड़ ही नहीं पाते हैं ( सूर्योदय के प्रारम्भ में )। चित्र में देखिए 👇

नोट: सुबह और शाम वाले स्थान पर पड़ने वाले लाल प्रकाश के बाद ( अंदर की तरफ जाने पर), नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला और बैगनी प्रकाश होतें। इनको चित्र में दर्शाया नहीं गया है। 





इस चित्र से स्पष्ट है कि सूबह और शाम को लाल किरण ही पृथ्वी पर पड़ पाती है और जो पृृथ्वी का भाग सूर्य  के ( दोपहर के समय ) फोकस पर होता है वहाँ पर सभी रंगों की प्रकाशीय किरणें सीधी पड़ती है और इसीलिए दोपहर के समय सूर्य सफेद दिखाई देता है। दूसरे शब्दों में कहें तो  जैसे - जैसे पृृथ्वी घूमती है तो ( पृथ्वी का वह भाग जहाँ सूर्योदय होना प्रारंभ हो गया होता है ) वह स्थान सूर्य से आने वाली किरणों के ( 0° से 90° की तरफ आने लगता है ) फोकस पर आनेे लगता है और बाकि प्रकाशीय (नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला और बैगनी ) रंग भी हमारी आँखों तथा पृथ्वी के उस भाग पर पड़ने लगते हैं।
  और इस   तरह सूर्य पहले लाल, से नारंगी, नारंंगी से पीला और अंत में सफेद दिखाई देता है।
 बिल्कुल इसी तरह जब सूर्य ढलता है तो फिर पृृथ्वी प्रकाश के समान्तर ( 180° कोण ) होने लगती है या फोकस से हटती जाती है और सबसे बाहरी प्रकाश यानी लाल प्रकाश ही पृथ्वी पर पड़ता है और यही रंग हमारी आँखों में पड़ता है। इसलिए सूर्य हमें सूर्योद और सूर्यास्त के समय लाल ही दिखाई देता है।



परिक्षण (testing) 
 अगर हमें इस जानकारी का परिक्षण करना है कि यह सही है या गलत तो हमें जरुर करना चाहिए क्योंकि हमेें बिना परिमाण या सबूत के किसी भी बात पर विश्वास नहीं करना चाहिए। हम जानते हैं कि हमारी आँखों में जिस रंग की किरणें पड़ती है हमेें वस्तु उसी रंग की दिखाई देती है। सूर्य के प्रकाश में सात रंग होते हैं जिसमें सबसे बाहरी या आगे लाल और सबसे आन्त्तरिक या पिछे बैगनी होता है। सुबह या शाम के समय सूर्य की किरणेें पृृथ्वी के समान्तर हो जाती हैैं । इसलिए प्रकाश की बाहरी किरणें लाल (अत्यधिक) और नारंंगी ( भी थोड़ी बहुत ) ही पड़ पाती हैं जो हमारी आँँखों में पड़ती है और फलस्वरूप हमें सूर्य लाल और हल्का नारंंगी जैैसा दिखाई देता है। अगर हम पृृथ्वी से इतनी उँँचाई  पर जाकर सूर्य को देखेें जहाँ से सूूर्य की सभी किरणेें सीधी हमाारी आँखों पर पड़े तो हमें सूूर्य श्वेत दिखाई देगा। या सुबह से 6 घंंटे बाद भी हम सूर्य को देखेें तो हमाारी आँखों और पृृथ्वी पर ये प्रकाशीय किरणेें बिल्कुल सीधी पड़ती है और परिणामस्वरूप हमें सूर्य (दोपहर के समय)  सफेद दिखाई देता है।




    पृृथ्वी के ऐसे दो अलग अलग स्थानों पर जहाँ एक ही समय सुुबह और दोपहर होते हैं। ऐसे स्थानों पर समय का 6 - 7 घंटे का फर्क होता है। ऐसे स्थानों पर जहाँ एक जगह दोपहर होती है तो वहीं दूसरी तरफ सबेरा होता है । इससे यह साबित होता है कि जैसा ( सूर्य का ) प्रकाश हमारी आँखों में पड़ता है वैसा ही सूर्य हमें दिखाई देता है।
 यहाँ से एक बात भी सामने निकलकर आती है कि जिस स्थान पर सबेरा सबसे पहले होता है वह पृृथ्वी का सबसे पूर्वी भाग होगा।
 इससे यह भी साबित होता है कि पृृथ्वी लगभग गोल है।

निष्कर्ष : 

 इस जानकारी को पढ़ने से स्पष्ट है कि सूर्य का रंग पृथ्वी पर प्रकाशीय कोण पर निर्भर करता है। जैसे सुबह को 0°, दोपहर को 90° और शाम को यह कोण 180° हो जाता है। सूर्य का प्रकाश और 180°  पर सबसे ज्यादा फैलता है क्योंकि इस कोण पर प्रकाश सबसे ज्यादा तिरछा या ( पृथ्वी के ) समान्तर होता है ना कि गैसीय या धूल कणो के कारण ऐसा होता है। 
 अत: स्पष्ट है कि सूर्य का रंग सूर्य के प्रकाशीय कोण पर निर्भर करता ना की प्रकाश प्रक्रिणन पर। 




 यह जानकारी आपको कैसी लगी अपनी किमती राय कमेंट बॉक्स में लिखकर भेज दिजिए। 
।। धन्यवाद ! ।। 

30 Oct 2019

Bodmas niyam fell / बोडमास नियम फेल ? 😮


क्या इन सवालों के जवाब हैं हमारे पास ?

  • ऐसे सवालों 2 ÷ 2 ÷ 2 ÷ 2 को किस तरफ से और क्यों हल किया जाता है ? 
  • इस  2 ÷ 2 ÷ 2 ÷ 2 प्रश्न का उत्तर क्या है ? 
  • 36 ÷ 4 × 3 का मान क्या होगा ? 3 या 27 
  • क्या Bodmas नियम पुरी तरह से लागू होता है ? 





अगर देखा जाए तो बहुत से लोगों को इस तरह के सवालों को लेकर कन्फ्यूजन बना रहता है कि किधर से हल करें और किधर से नहीं।






नोट:इस तरह के सवालों को हल करने और समझाने का संभवतः पुरा प्रयास किया गया है, अगर फिर भी कोई कमी हो तो कमेंट जरुर करें। धन्यवाद ? 


   आपको बता दे कि हम ऐसे 2 ÷ 2 ÷ 2 ÷ 2  किसी भी सवाल को किसी भी तरफ से हल कर सकते हैं। ऐसा करने पर मान में कोई अंतर नहीं होगा। पर कैसे ?  जानने के लिए पुरा आर्टिकल ध्यान से जरूर पढ़िएगा।



              बोडमास ( Bodmas ) एक ऐसा नियम है, जो ऐसे सवालों 36 ÷ 4 × 3 , 8 ÷ 4 ( 2 + 2), 
 2 ÷ 2 ÷ 2 ÷ 2 = ? को हल करने के लिए बनाया गया है पर क्या आप जानते हैं कि यह नियम पुरी तरह से सही है या काम करता है ? । यह बात इन उदाहरणों से निकलकर आ रही है । चलो मान भी लेते हैंं  कि Bodmas नियम गलत है तो कोई ऐसा कारण तो दो जिससे यह सिद्ध हो सके कि Bodmas नियम पुरी तरह से उपयोगी नहीं है । कारण स्पष्ट और सरल है पर इसे जानने से पहले बोडमास नियम क्या है हमेें एक नजर डाल लेना  चाहिए। बोडमास नियम इस प्रकार है -

  1. B (= Brackets ) सबसे पहले कोष्टकों का हल करना। 
  2. O ( = of ) फिर " का " हल करना। 
  3. D ( = Division ) फिर भाग का हल करना ।
  4. M ( = Multiplication ) गुणा का हल करना। 
  5. A  ( = Addition ) जोड़ / घटना हल करना। और
  6. S  ( = Subtration ) घटाने का हल करना। 


क्या हम सब ऐसा कोई कारण दे सकते हैं कि Bodmas नियम क्यों सही है। 
   इन प्रश्नों को देखिये - 
  •  कोष्टकों को हल करने के बाद भाग ही क्यों दिया जाता है ?
  • भाग के बाद ही गुणा क्यों किया जाता है ?
  • बोडमास नियम से सवाल सही हल हुआ है या नहीं इसके लिए कोई परिक्षण सूत्र है क्या ? 


बाकि सवाल हम उदाहरण में देखेंगे 👇
चलिए जानते हैं विस्तार से : - 

उदाहरण ( Examples ) 

प्रश्न : 1.     36 ÷ 4 × 3 का हल करिए। 

हल :         Bodmas नियम के अनुसार भाग पहले करेंगे। इसलिए 36 में 4 की भाग करने पर 9 आयेगा। 
36 ÷ 4 = 9 
अब 9 का गुणा 3 के साथ करेंगे तो 
9 × 3 = 27 
अतः 36 ÷ 4 × 3 = 27
उत्तर  = 27 



             सबसे बड़ा और आवश्यक सवाल यह है कि यह सवाल 36 ÷ 4 × 3 इस क्रम में कैसे, क्यों और कहांँ से आया है ? क्या Bodmas नियम इसकी जानकारी देता है ? इस तरह बोडमास नियम में परिक्षण करने का अभाव झलक रहा है। इस तरह यह एक बड़ी कमी है । फिलहाल चलिए हम इसका परिक्षण करते हैं कि यह क्यों, कैसे और कहांँ से आया है। 





परिक्षण ( Testing )   1.

इस सवाल 36 ÷ 4 × 3   में अगर 3 ना होता तो यह इस प्रकार 36 ÷ 4 होता, जिसे हम ऐसे 36 / 4 लिख सकते हैं। अब अगर ( 36 / 4 ) में हम 3 को 4 के साथ गुणा करके रखना चाहे तो हम 3 को कहाँ और कैसे लिखेंगे। इसको हम निचे दिए गए चित्रानुशार लिखेंगे - 

चित्र संख्या :-  1. 



यहाँ ( चित्र संख्या : 1. ) में हम देख रहे हैं 36 में पहले 4 से भाग है फिर 3 का (  36 / 4 ) के पुरे मान में भाग है जिसका मतलब यह है कि 3 का 4 में गुणा है।
     इसी चीज को हम प्रत्यक्ष या डायरेक्ट रुप  हम में 36 ÷ 4 × 3 लिख देते हैं। चित्र से एक बात यह भी स्पष्ट हो रही है कि जब बड़ा बटा ( अपाॅन ) हो तो इसका मतलब यह है कि पुरे मान में भाग हो रही है निचे वाली संख्या से। यहां पर निचे वाली संख्या 3 है। एक बात यह भी स्पष्ट है कि हम 36 में 4 पहले भाग दे सकते हैं क्योंकि यह बड़े वाले बटे के अन्तर्गत है और इसके बाद फिर हम 3 से ( 36 / 4 = 12 ) में भाग दे सकते हैं।

अगर इस उदाहरण में हम 4 और 3 दोनों को एक-दूसरे के स्थान पर बदलकर ( 36 ÷ 3 × 4 ) लिखें तो मान क्या होगा। Bodmas नियम से हल करें तो इसका मान इस प्रकार होगा :-
36 ÷ 3 × 4 = 12 × 4 = 48


और अगर ऊपर बताए गए उदाहरण ( चित्र संख्या : 1. के अनुसार )  हल करें तो इसका मान भी 3 ही आयेगा जो इस प्रकार है :-
36 ÷ 3 × 4 = 36 ÷ 12 = 3

चित्र संख्या : 2.

इस तरह यहाँ चित्र संख्या : 2 वाले उदाहरण से हम यह देख रहे हैं कि इनके ( 3 और 4 ) के स्थान बदलने पर पर भी इनके ( 36 ÷ 4 × 3  और 36 ÷ 3 × 4 ) के मान में कोई परिवर्तन नहीं हो रहा है। अतः हम इसे इस तरह लिख सकते हैं -
36 ÷ 4 × 3 = 36 ÷ 3 × 4

अगर बटा एकसमान हो तो इसका मतलब यह है कि एक पहली संख्या या मान में दूसरे और दूसरे में तिसरे से भाग हो रही है। जैसे यहाँ 36 में 4 और 4 में 3 से भाग चित्र संख्या : 3. में दिखाया गया है।
चित्र संख्या : 3.




जब हम इस चित्र में दिखाए बटे को भाग के रूप में लिखेंगे तो यह इस तरह होगा :-
36 ÷ 4 ÷ 3 = 36 × 3 ÷ 4 = 9 × 3
36 ÷ 4 ÷ 3 = 27

चुँकि 36 में 4 की भाग है और 4 में 3 की भाग है तो स्पष्ट है कि 3 का विरोधी 4 है और 36 का सहायक है यानी 36 में 3 का गुणा होगा।



परिक्षण ( Testing )  2. 

गुणा को भाग में बदलकर ( × ➡️ ÷ )


   125 = 5 × 5 × 5   के रूप में लिख सकते हैं। अब ( 5 × 5 × 5 ) इनको भाग रूप में इस प्रकार लिखेंगे -
 5 × 5 × 5 = 5 ÷ 1 ÷ 5 ÷ 1 ÷ 5


यहाँ पर निम्न प्रश्न उठ रहे हैं - 
  • यह कैसे आया है ? 
  • भाग ( ÷ ) के चार चिन्ह कैसे आये जबकि गुणा ( × ) के दो ही चिन्ह थे ? 
इसको हम इस चित्र से समझ सकते हैं। 

चित्र संख्या : 4.



स्पष्टीकरण : हम जाानते हैं कि गुणा का उल्टा भाग है। गुणा और भाग मेें निम्न संबंध होता है -

  • भाग = 1 / गुणा  या   गुणा = 1 / भाग

जैसे मान 6 × 3 में जब गुणा को भाग में बदलेंगे तो 3 का उल्टा 1 / 3 हो जायेगा। 1 / 3 को भाग रुपमे 1÷ 3 लिखेंगे। इस तरह  6 × 3 को 6 ÷ 1 ÷ 3
के रुप में लिख सकते हैं। बिल्कुल इसी तरह से
5 × 5 × 5 = 5 ÷ 1 ÷ 5 ÷1 ÷ 5   लिख देते हैं।
इस तरह भी 5 × 5 × 5 हमें मिल रहा है जो कि आना चाहिए। अतः यह विधि सही है। और बोडमास विधि गलत साबित होती हुई दीख रही है।
इस तरह दो गुणा के चिन्ह चार भाग के चिन्ह मे बदल जाते हैं।
 चलिए इस नियम के अनुसार 36 ÷ 4 × 3 का भी परिक्षण कर लेते हैं।
36 ÷ 4 × 3  में  3 के सामने के गुणा के चिन्ह को भाग में बदलेंगे तो 3, 1 / 3 या 1 ÷ 3 में परिवर्तित हो जायेगा। इस तरह 36 ÷ 4 × 3 = 36 ÷ 4 ÷ 1 ÷ 3
चित्र संख्या : 4. के अनुसार हो जायेगा।
36 ÷ 4 ÷ 1 ÷ 3   का हल इस तरह होगा -
36 × 1 ÷ 4 × 3 = 36 ÷ 12 = 3

यहाँ से भी हमे वही उत्तर मिला है जो पहले दो उदाहरणों से मिला था। 


भाग को गुणा में बदलकर ( ÷ ➡️ × )

36 ÷ 4 × 3 में भाग का चिन्ह ( ÷ ), 4 के आगे है और हम जाानते हैं कि गुणा और भाग एक - दूसरे के उल्टे हैं। इसलिए 36 × ( 1/ 4 × 3 ) हो जायेगा। 
तब, 36 / 12 = 3.
     चलिए ( 5 ÷ 1 ÷ 5 ÷ 1 ÷ 5  = 125 ) को हम गुणा रुपमे बदलकर देखते हैं कि इनका मान 125 आ रहा है कि नही अगर आयेगा तो यह विधि सही होगी जो हम अपना रहे हैं। सबसे पहले हमें यह देखना है कि हम इसे किस तरफ से हल करेंगे ? 
  1. दाँयीं तरफ से हल करेगें ? या 
  2. बाँयीं तरफ से हल करेंगे ? 

इसका जवाब है दोनों तरफ से हल कर सकते हैं। 

दाँयीं तरफ से हल करना 

 इस 5 ÷ 1 ÷ 5 ÷ 1 ÷ 5  = ? (? = 125 ) सवाल को दाँयीं तरफ से हल करने के लिए सबसे पहले हम 1 ÷ 5 को हल करेगें जो सबसे दाँयाँ वाला मान है। 
1 ÷ 5 = 1 / 5 हो जायेगा। 
अब  5 ÷ 1 ÷ 5 ÷ 1/5 हो गया। 
फिर सबसे दाँयाँ वाले ( 5 ÷ 1/ 5 ) को हल करेगें। तब, 5 ÷ 1/5 = 25 हो जायेगा। 
अब 5 ÷ 1 ÷ 25 हो गया। 
फिर सबसे दाँयें वाले ( 1 ÷ 25 ) मान को हल करने पर, 
1 ÷ 25 = 1/25
अब 5 ÷ 1/25 को हल करने पर, 
5 ÷ 1/25 = 5 × 25 = 125

हम देख रहे हैं कि भाग करने पर 125 आ रहा हैं जो कि सही है। चलिए अब बाँयीं तरफ से हल करके भी देख लेते हैं कि इस तरह से क्या आता है। 


बाँयीं तरफ से हल करना 

  5 ÷ 1 ÷ 5 ÷ 1 ÷ 5 =  ? 
   इसमें सबसे बाँयीं भाग 5 ÷ 1 है। अतः 5 ÷ 1
  को हल करने पर,
5 ÷ 1 = 5 / 1
अब 5 / 1 ÷ 5 ÷ 1 ÷ 5 हो गया है। (यहां पर ध्यान देने वाली बात यह है कि बीच वाले 5 का 1 में भाग है।) अतः 5 से 1 मे ही भाग देनी होगी। तब ,
5 / 1 / 5 = 25 हो जायेगा। ( चित्र संख्या : 3. को देखें )
चुंँकि दाहिने वाले 1 से 5 में भाग थी जिसका गुणा पहले या बाँये वाले 5 में होने के कारण 25 हो गया है। अतः 25 में ही 1 की भाग होगी।
तब 25 ÷ 1 = 25 / 1
अब 25 / 1 ÷ 5 बचा है। इसे हल करने पर,
25 / 1  / 5 = ( 25 × 5 ) / 1 = 125.

इस तरह हम यह देख रहे हैं कि चाहे दाँयीं तरफ़ से भाग करो या बाँयीं तरफ से कोई फर्क नहीं पड़ता है।




हर तरफ से हल करने पर उत्तर सही कैसे आता है ? 

  यह सवाल बहुत आवश्यक और जरूरी भी है। इसलिए इसको भी शामिल किया गया है। 

उदाहरण 1. 1+ 2 + 3 + 4 को हम किधर से भी हल करें पर उत्तर में कोई फर्क नहीं पड़ता है पता है क्यों ? क्योंकि इस सवाल में एक ही प्रकार के के चिन्ह ( जोड़ के चिन्ह ) हैं। 
मान लिया हम 1+ 2 + 3 + 4  इसे दाहिने तरफ से हल करते हैं तब सबसे दाहिनी तरफ 3 और 4 हैं तो ( 3 + 4 ) को जोड़ने पर , 
3 + 4 = 7 होगा। अब 1+ 2 + 7  के रूप में सवाल बदलकर हो गया है। अब फिर सबसे दाहिनी तरफ से हल करने पर यानी 2 + 7 को जोड़ने पर, 
2 + 7 = 9 हो गया अब 1 + 9 बचा है जिसको जोड़ने पर, 
1 + 9 = 10 आ रहा है।

इसी तरह हम बाँयीं तरफ से हल करेंगे या जोड़गे तो भी उत्तर 10 ही आयेगा। 
मान लिया 2 × 3 × 4 को हल करना है। पहले 2 × 3 का गुणनफल लें, 2 × 4 का गुणनफल ले या 3 × 4 का गुणनफल लें। कोई फर्क नहीं पड़ता है उत्तर में। उत्तर हमेशा 24 ही आयेगा। इस तरह हम जो भी गणना करें सबसे पहले उसे किसी भी एक प्रकार के चिन्ह में बदल लेना चाहिए। और तब हम चाहे जिधर से भी हल करें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। 


  आशा करता हूँ आपका सारा कन्फ्यूजन या डाउट क्लियर हो गया होगा। अगर अब कोई सवाल या राय है तो कमेंट करें । धन्यवाद! 
By : Possibilityplus.in


25 Oct 2019

पृथ्वी पर पानी है पर चन्द्रमा पर नहीं ऐसा क्यों ?


पृथ्वी पर पानी है पर चन्द्रमा पर नहीं ऐसा क्यों ???


  पृथ्वी और चंद्रमा दोनों पर पानी के होने या ना होने की वजह है इनका वातावरण।

 अब ये वातावरण  क्या है इसको जाने बिना हमारी जानकारी अधुरी है। 









वातावरण (atmosphere,environment) 


    वातावरण का शाब्दिक अर्थ जानने के लिए हमें इसका संधि विक्षेद करना होगा।
संधि विक्षेद
वातावरण = वात + आवरण

वात का मतलब हवा  ( हवा = वात, वायु, बयार, पवन आदि ) होता है। इसके बाद आवरण का मतलब परत, कवर आदि होता है। इन दोनों शब्दों को एक साथ मिलाकर अर्थ निकाले तो इसकी परिभाषा इस प्रकार होगी -
वातावरण : हमाारे चारों तरफ जो हवा का आवरण है इसे ही वातावरण कहते हैं।
  अब सवाल यह है कि यह वातावरण किस बात पर निर्भर करता है, कैसे बनता है और क्यों ?


  

वातावरण उत्पन्न होने के कारण

वातावरण को उत्पन्न करने वाला कारण है गुरुत्वीय त्वरण (gravitational acceleration)
    जिस ग्रह का गुरुत्वीय त्वरण जितना अधिक होगा उस ग्रह पर उतना ही ज्यादा वातावरण होगा। हम जानते हैं कि पृथ्वी का गुरुत्वीय त्वरण चन्द्रमा से अधिक है। यही कारण है कि चन्द्रमा पर वातावरण बहुत कम है। अब आती है उस सवाल की जो सारे सवालों का जवाब देगा। क्या गुरुत्वीय त्वरण भी किसी कारण पर निर्भर है या इसकी उत्पत्ति का कारण क्या है ? 


गुरुत्वीय त्वरण उत्पत्ति का कारण

  पृथ्वी हो या कोई भी ग्रह सभी के गुरुत्वीय त्वरण उसकी अपनी अक्ष पर घूमने के वेग पर निर्भर करता है। जो ग्रह अपनी अक्ष पर जितना तेजी से घूर्णन (घूमना ) गति करेगा उसका गुरुत्वीय त्वरण उतना ही अधिक होगी। हम जानते हैं कि त्वरण " वेग परिवर्तन की दर को कहते हैं। "
अतः स्पष्ट है कि ग्रह के गुरुत्वीय त्वरण के उत्पत्ति का मुख्य कारण उस ग्रह का घूर्णन वेग ही है। उदाहरण के लिए पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमते हुए एक चक्कर लगाने में लगभग 24 घंटे लगते हैं जबकि चन्द्रमा को अपने अक्ष पर घूमते हुए एक चक्कर लगाने में लगभग 27. 3 दिन   लगते हैं।
   हमें यह साफ अन्तर दिखाई दे रहा है कि चन्द्रमा की अपने अक्ष परित घूर्णन गति पृथ्वी के मुकाबले बहुत कम है। जाहिर सी बात है कि जब घूर्णन गति कम होगी तो गुरुत्वाकर्षण या गुरुत्वीय त्वरण कम होगा।







पृथ्वी पर पानी होने और चन्द्रमा पर नहीं होने का कारण ( पलायन वेग द्वारा ) 


पलायन वेग :   जब हम किसी पिंड को पृृथ्वी से ऊपर की ओर फेेंकते है तो वह पृथ्वी पर वापिस लौट आता है। यदि हम पिंड वेग बढ़ातेे जाये तो एक वेग ऐसा आयेगा जिस वेग से पिंड को फेंके तो पिंड पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल से अधिक होने के कारण पृृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र को पार कर जायेगा। पलायन का मतलब ही यही होता है कि सदा - सदा के लिए एक स्थान को छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर जाना। 
   
 पलायन वेग वह न्यूनतम वेग है जिससे किसी पिंड को ऊर्ध्वाधर ऊपर की ओर फेकने पर पिंड पृृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र को पार कर जाता है तथा पृथ्वी पर कभी वापिस नहीं लौटता। 
पलायन वेग का 
सूत्र   ve √ (2gRe

जहाँ ve = पलायन वेग 
g = ग्रह का गुरुत्वीय त्वरण 
Re = ग्रह की त्रिज्या है।

 इस सूत्र से स्पष्ट है कि अगर जिस ग्रह का गुरुत्वीय त्वरण और ग्रह की त्रिज्या जितनी कम होगी उसका पलायन वेग उतना ही कम होगा। इसका मतलब यह है कि ग्रह पर वायुमंडल या वातावरण होने के कारण ग्रह का द्रव्यमान पर भी निर्भर करता है। 


पृथ्वी और चंद्रमा का पलायन वेग ( Earth and Moon's Escape Velocity ) 

 प्रयोग द्वारा पृथ्वी की 
त्रिज्या  R= 6. 37 × 106मीटर
गुरुत्वीय त्वरण g = 9.8 मीटर / सेकण2

सूत्र   ve = √ (2gRe)  से 

ve = √ (  2 × 9.8 ×   
6. 37 × 106   ) 
  पृथ्वी पर पलायन वेग = 11.2  किमी / सेकण 



चन्द्रमा पर पलायन वेग 
प्रयोग द्वारा चन्द्रमा की
 त्रिज्या  Re  = 1.74 × 106मीटर
गुरुत्वीय त्वरण g = 1.63 मीटर / सेकण2

सूत्र   ve = √ (2gRe)  से 


ve = √ (2 × 1.63 × 1.74 × 106    )  
पलायन वेग ve = 2.38 किमी / सेकण 






      हमारे वायुमंडल में पृथ्वी पर उच्चतम संभव ताप पर हल्के से हल्के अणुओं (  हाइड्रोजन के अणुओं ) का भी औसत (ऊष्मीय) वेग, पलायन वेग से बहुत कम है। उदाहरण के लिए, 500 K ताप पर हाइड्रोजन के अणुओं के का औसत ऊष्मीय वेग 2.5 किमी / सेकण है, जबकि पलायन वेग 11.2 किमी / सेकण है। अतः हाइड्रोजन के अणु ही नहीं बल्कि अन्य गैसें भी  पृथ्वी को छोड़कर नहीं जा पाते हैं। अतः पृथ्वी के चारो ओर वायुमंडल या वातावरण है। 
      हम देख रहे हैं कि चन्द्रमा पर पलायन वेग औसत ( ऊष्मीय ) वेग से कम है। यही कारण है कि चन्द्रमा पर पानी नहीं टीक पाता है। अगर हम चन्द्रमा पर पानी रख भी दे तो यह सूर्य की गर्मी ( प्रकाश की गर्मी ) से भाँप बनकर उड़ जाता है ( जल का ऊष्मीय चन्द्रमा के  वेग पलायन वेग से अधिक है इसलिए ) जबकि पृथ्वी पर जब जल वाष्प बनकर उड़ता है तो इनका जल का ऊष्मीय वेग पृथ्वी के पलायन वेग से कम ही रहता है। 
 यही कारण है कि पृथ्वी पर पानी का चक्रण बना रहता है और पानी पाया जाता है। 




आपको यह जानकारी कैसी लगी अपने कमेंट के माध्यम से जरूर बताएँ। धन्यवाद! 


24 Oct 2019

भाज्य और अभाज्य संख्या क्या है ?


भाज्य और अभाज्य संख्याओं की जानकारी (सरल शब्दों में) 




 भाज्य और अभाज्य का नाम सुनते ही बहुत से छात्र - छात्राओं को गणित में बोरियत महसूस होने लगता है। कारण है तो जानकारी का अभाव। चलिए जानते  हैं >>






   भाज्य संख्या :  वे संख्याएँ जो 1 और स्वयं को छोड़कर किसी अन्य संख्या से (बिना दशमलव के) विभाजित हो जाये भाज्य संख्या कहलाती है। 


जैसे : 4, 6, 8, 9, 10, 12, 14, 15, 16, 18, 20 इत्यादि भाज्य संख्याएँ हैं। इन सभी संख्याओं में 1 और स्वयं के अलावा किसी तिसरी संख्या से पुरी - पुरी विभाजित या कट रही हैं।

4 = 1 × 2 × 2

6 = 1 × 2 × 3
8 =  1 × 2 × 4

 जैसे : 4, 1 और 4 के अलावा 2 से पुरी तरह से विभाजित या कट रही है। अतः 4 एक भाज्य संंख्या है। इसी तरह 6 ,2 और 3 से विभाजित हो रही है। अतः 6 भी एक भाज्य संख्या है। इसी तरह हम बाकि सभी भाज्य संख्याओं का पता कर सकते हैं। यहाँ हम देख रहे हैं कि जो भी भाज्य संख्या है उसका ( 1 और  स्वयं के अलावा ) कुछ न कुछ गुणनखंड जरूर होता है। इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि " वे सभी संख्याएँ जिनका 1 और स्वयं के अलावा कोई गुणनखंड हो तो उन्हें भाज्य संख्या कहते हैं। " 





    अभाज्य संख्या :  वे संख्याएँ जो 1 और स्वयं को छोड़कर किसी अन्य संख्या से विभाजित न हो अभाज्य संख्या कहलाती है। 

                              या 

वे संख्याएँ जिनका गुणनखंड  अथवा पूर्ण गुणनखंड न हो ( 1 और स्वयं को छोड़कर) या नहीं किया जा सकता है उन्हें अभाज्य संख्या कहते हैं। 

जैसे : 2, 3, 5, 7, 11, 13, 17, 19, 23, 29, 31 इत्यादि अभाज्य संख्याएँ हैं। इन सभी संख्याओं का गुणनखंड क्रमशः है - 

2 = 1 × 2
3 = 1 × 3
5 = 1 × 5
7 = 1 × 7  इत्यादि । 

  हम  देख रहे हैं कि इनका गुणनखंड 1 और स्वयं के अलावा कोई अन्य संख्या नहीं है अतः ये सभी संख्याएँ अभाज्य हैं। 

अभाज्य गुणनखंड : ऐसा गुणनखंड जिसमें केवल अभाज्य संख्याएँ शामिल हों अभाज्य गुणनखंड कहलाता है। 


उदाहरण :  
  • 2 × 3 
  • 5 × 7
  • 11 × 13

  • 17 × 19
  • 23 × 29
  • 31 × 37 
  • 2 × 3 × 7
  • 11 × 13 × 19
  • 2 × 17 × 23 × 29





ये सभी अभाज्य गुणनखंड हैं क्योंकि इनमें अभाज्य संख्याओं का गुणा है इसलिए इन्हें अभाज्य गुणनखंड कहते हैं। 





विशेष :
  •  एक ( 1) न तो भाज्य संख्या है और न ही अभाज्य संख्या है। 
  • दो ( 2 ) एकलौती सम अभाज्य संख्या है। 
  • दो (2) पहली अभाज्य संख्या है और अंतिम अभाज्य संख्या पता नहीं की जा सकती है। 
  • चार (4) पहली भाज्य संख्या है और अंतिम अभाज्य संख्या पता नहीं की जा सकती है। 



ये जानकारी पढ़कर आपको कुछ समझ में आया हो तो अपने विचार 💭 हमें कमेेन्ट करके जरूर बताएँ। आपका धन्यवाद !

17 Oct 2019

सूर्य के प्रकाश में सात रंग क्यों होता है ?


   सूर्य ☀ के प्रकाश में सात रंग होते हैं यह लगभग हर शक्स जानता ही होगा। पर यह क्यों होता है यह बहुत कम लोग ही जानते होंगे। इस सवाल का जवाब जानने से पहले हमें एक और महत्वपूर्ण सवाल देखना अतिआवश्यक है और वो है सूर्य के प्रकाश के रंग का विशेष क्रम में होना - लाल (Red) , नारंगी(Orange, पीला(yellow)  हरा(Green), आसमानी (Sky), नीला (Blue) तथा बैगनी( Violet)

    



    आखिर इसी क्रम में ही क्यों होते हैं ये सभी रंग ? इससे पहले हम पहले सवाल का जवाब /उत्तर देख लेते हैं। 



सूर्य के प्रकाश में सात रंग क्यों होते हैं ?

  सूर्य के प्रकाश में सात रंग नहीं बल्कि विभिन्न प्रकार के रंग होते हैं और यह इतनी तिव्रता से बदलते हैं कि हमारी आँखेें इन सभी रंगों को देखने में सक्षम नहीं होती है और देख नहीं पाती है ।  हमारी आँखें केवल उन्हीं सात रंगों ( लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला और बैगनी )  को देख पाती है जो परिणामी रुपसे स्थिर होते हैं और आँख की क्षमता के अनुरूप होते हैं । इस तरह हम कहते हैं कि सूूर्य के प्रकाश में सात रंग ही होते हैं। इस घटना को यह कहावत पुरी तरह से सूट करती है " जो होता है वह दिखता नहीं और जो दिखता है वह होता नहीं है " 






   सूर्य के प्रकाशीय रंग विशेष क्रम में क्यों ? 


    सूर्य के प्रकाश के सात रंग लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला और बैगनी इसी क्रम में ही क्यों होते हैं ? यह सवाल बहुत ही महत्वपूर्ण है। 

    दरअसल प्रकाश के रंग और ऊष्मा दोनों में गहरा संबंध होता है। प्रकाश की जननी ( माँ ) ऊष्मा है क्योंकि बिना ऊष्मा के कोई भी प्रकाश उत्पन्न नहीं होता। इसलिए जैसी ऊष्मा वैसा रंग ( प्रकाशीय रंग ) होता है। इन सातों प्रकाशीय रंगों में सबसे कम ऊष्मा लाल रंग की और सबसे ज्यादा ऊष्मा बैगनी रंग की होती है। जब सूर्य से ऊष्मा निकलती तो यह प्रकाशीय रंगों के रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान तक संचरित होती है। यहाँ पर एक सवाल उठ सकता है कि ऊष्मा प्रकाशीय रंगों के रूप में संचरित होती है तो हमें इसकी जानकारी कितााबों में पढ़ने को क्यों नहीं मिलती है ? 



चलिए मान लते हैं कि यह सही है। तो इसका उदाहरण दो जो यह सिद्ध कर सके कि हाँ यह जानकारी सही है। अगर आप ऐसा सोच 💭 रहे हैं तो यह आपकी सार्थक और सही👌 सोंच है। चलिए उदाहरण देखते हैं 🔎

उदाहरण ( Example) 
  
प्रकाश का विभिन्न माध्यमों में गमन : जब    प्रकाश केे मार्ग में कोई रंगहीन या पारदर्शी वस्तु होती है तो प्रकाश ना परावर्तित होता के और ना ही अवशोषित ( होता है पर लगभग नगण्य होता है इसीलिए इसे गणना में शामिल नहीं किया जाता है ) । चुँकि कोई भी रंग वस्तु में नहीं होता है तो वस्तु  द्वारा प्रकाशीय रंगों को परावर्तित नहीं हो पाता है और प्रकाश पुरी तरह से आरपार हो जाता है। इस तरह की वस्तुओं को पारदर्शी वस्तुएँ कहते हैं। जैसे : काँच, शुुद्ध जल इत्यादि। अगर उसी वस्तु ( जैसे - काँच ) को किसी (लाल) रंग से रंग दिया जाये तो वही वस्तु(काँच) पारदर्शी नहीं रह जायेगी क्योंकि जिस (लाल) रंग से वस्तु ( जैसे - काँच ) को रंगेंगे तो वह (लाल) रंग लाल प्रकाशीय रंग को परावर्तित कर देगा ( और बाकी प्रकाशीय रंग नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला, और बैगनी आरपार  हो जातेे हैं ) और वही (लाल) प्रकाशीय रंग हमारी आँखों में पड़ता है तो उसी(लाल) रंग की वस्तु हमें दिखाई देगी । 
 
लोहे को गर्म करना : जब किसी लोहे को गर्म किया जाता है तो लोहा पहले लाल फिर गाढ़ा  लाल फिर पीला और अन्त में श्वेत दिखाई देता है। यहाँ पर सोचने वाली बात यह है कि बाकि चार प्रकाशीय रंग ( नारंगी, हरा, आसमानी और नीला ) लोहे को गर्म करने पर क्यों नहीं दिखाई दिए ? 
दरअसल जिन - जिन प्रकाशीय तरंगों का तरंगदैर्ध्य बड़ी होती है वो ही रंग आसानी से दिखाई देते हैं। अब ये तरंगदैर्ध्य क्या है ? 

तरंगदैर्ध्य ( Wave length ) : माध्यम के किसी कण को एक कम्पन करने में लगे समय के दौरान तरंग द्वारा चली गई दुरी को तरंगदैर्ध्य कहते हैं।  
                           या
तरंग की चाल और और के अनुपात को तरंगदैर्ध्य कहते हैं। 
सूत्र    v = n × λ
जहाँ v = तरंग की चाल 
n = तरंग की आवृत्ति तथा
λ = तरंग की तरंगदैर्ध्य 
 λ = v / n
इस सूत्र ( λ = v / n ) से स्पष्ट है कि n = ( आवृत्ति ) का मान जितना अधिक होगा उतना ही तरंगदैर्ध्य( λ) का मान भी कम होगा। इसको अच्छे से समझने के लिए आवृत्ति की परिभाषा हमें जानना होगा।

आवृत्ति(Frequency) : दोलन करने वाली कोई वस्तु 1 सेेेकेंड में जितने दोलन करती है वह संख्या उस वस्तु की आवृत्ति कहलाती है।


उदाहरण 🔎आवृत्ति को साधारण शब्दों में समझे तो मान लिजिए कोई पंखा जिसके ब्लेड या पत्तियाँ पंखे के रूकेे रहने पर स्पष्टरूप से दिखाई देती हैं और इसकी आवृत्ति शूून्य होती है ।  पर जैसे-जैसे पंखा चलने लगता हैै तो इसकी आवृृत्ति बढ़ने लगती है और पत्तियाँ धूँधली दिखाई पड़ने लगती है। पंखे की गति जितनी तेज होगी पंखे आवृत्ति बढ़ती है और की पत्तियों का दिखाई देना उतना ही कम होता जायेगा। ठीक इसी तरह जिस प्रकाशीय तरंगों की आवृत्ति जितना अधिक होगी वह उतना ही धुँधला या कम दिखाई देगा। 

पानी में उत्पन्न विक्षोभ (हलचल) : जब पानी 
के ऊपर कोई वस्तु फेंकी जाती है तो पानी के ऊपर एक विक्षोभ या हलचल उत्पन्न होती है जो वृत्ताकार रुपमे 360° का कोण बनाते हुए चारों ओर समान रूप से फैलता जाता है। इस विक्षोभ रूपी तरंग और प्रकाशीय तरंग में यह समानता है कि इन दोनों के बाहरी विक्षोभ की तरंगदैर्ध्य बड़ी होती हैं और आसानी से देखा जा सकता और इसका कारण है आवृत्ति। 



हम जानते हैं कि प्रकाशीय रंगों की आवृृत्ति के बढ़़ते हुए क्रमशः लाल , नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला, आसामानी, बैगनी है ।
इसका मतलब साफ है कि सबसे स्पष्ट और सबसे ज्यादा लाल  और सबसे कम स्पष्ट बैगनी दिखाई देगा। इसी वजह से आग में लाल व पीला रंग ज्यादा दिखाई देता है। 


    आग का रंग ? 

      आग 🔥 का रंंग लालीमा लिए हुए पीला ज्यादातर होता है। जिसमें लाल रंग सबसे बाहरी तरफ और पीला रंग लगभग बीच या अन्दर होता है। ऐसा क्यों होता है ?  क्यों न लाल प्रकाश अन्दर और पीला बाहर होता। इन सभी उदाहरणों से यही स्पष्ट हो रहा है कि लाल सबसे कम ऊष्मा और श्वेत सबसे अधिक ऊष्मा का प्रतिक  हैं और इसीलिए ये सभी इसी क्रम में ( लाल, नारंंगी , पीला, हरा, आसमानी, नीला और बैगनी ) होते हैं। 
       

      प्रकाश की ऊष्मीय ऊर्जा समान रूप से 360° डिग्री का कोण बनाते हुए हर संभव दिशााओं  में संचरित होती है। इस प्रकार प्रकाशीय रंगों का का एक वृत्त बन जाता है जिसके सबसे बाहरी भाग में लाल रंग और सबसे आन्तरिक भाग में बैगनी होता है। 




पर यह इतने पास - पास होतें हैं कि आँखें इनमें अन्तर नहीं कर पाती हैं पर जैसे ही ये प्रकाश किसी विचलन भरेे माध्यम से होकर गुजरतेे हैं तो इनके बीच की दूरी बढ़ जाती है और इनकी ऊष्मीय ऊर्जा में कमी भी हो जाती है। इसलिए हमें ये सातों रंग आसानी से दिखने लगते हैं। 

   यही कारण है कि ये सभी सातों प्रकाशीय रंग लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला और बैगनी  को इस क्रम में रखा या लिखा जाता है। 
इस तरह श्वेत (सफेद) प्रकाश की ऊष्मा इन सभी सातों रंगों से अधिक होती है या इन सभी के योग के लगभग बराबर होती है। क्योंकि हम जाानते हैं कि इन सातों प्रकाशीय रंगों से मिलकर ही श्वेत प्रकाश बना है। 
    



 प्रकाशीय रंगों का व्यवहारिक जीवन में उपयोग। (Use of optical colors in practical life. )

  
    प्रकाशीय रंगों के निम्नलिखित ऊपयोग देखिए - 
  • श्वेत प्रकाश को ज्यादा समय तक देखने से हमारी आँखें और सर गर्म होता है। 
  • आँखों को जल्दी से ठँडा करने के लिए हमें काला / काली वस्तुओं को देखना चाहिए। 


   इसे 👇 पढ़ने के लिए क्लिक करें। 
   सूर्य सुबह और शाम लाल क्यूँ दिखाई देता है ?


इन उदाहरणों को पढ़ने के बाद आपको क्या लगा या आपकी क्या राय है । अपने महत्वपूर्ण सुझाव हमसे जरुर शेयर करें। धन्यवाद !

Email : dkc4455@gmail.com

5 Oct 2019

Isro ( इसरो ) ka fullform.



  इसरो का पुरा नाम    






इसरो का पुरा नाम क्या है ?
इसरो का पुरा नाम ( हिन्दी में ) 
" भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन " है।




ISRO fullform in english 
I  = Indian
S = Space 
R = Research 
O = Organisation 








      ISRO भारत में कहाँ पड़ता है ?     

    इसरो का मुख्यालय भारत के कर्नाटक राज्य की राजधानी बैंग्लोर ( बैंगलुरू ) में है। इसरो का पुरा नाम जानने के बाद यह पता चलता है कि यह भारत के लिए अंतरिक्ष कार्यक्ररमों को बढ़ावा देेन के लिए है। इसी संस्था के कारण हम मोबाईल 📱,  टीवी 📺, इंटरनेट आदि का उपयोग कर पा रहे हैं। यही संस्था उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजकर उन्हें एक निश्चित कक्षा में स्थापित करती है जिससे वह संबंधित जानकारी देता रहे। 


इसे भी पढ़ें 👇
 LKG&UKG fullform 





आशा है आपके लिए यह पोस्ट उपयोगी साबित हुआ होगा।


25 Sep 2019

शब्दों की ऐसी जानकारी जो जिंदगी बदल देगी..




  हते हैं कि ज्यादा बोलना हमारे लिए सही नहीं होता है , ज्यादा बोलने से काम बिगड़ जाते हैं ।  हम जिस भी काम के बारे में काम से ज्यादा बात करते हैं तो वह काम या तो होता नहीं या फिर जैसेे-तैसे ही हो पाता है। काम बिगड़ने के अनगिनत कारण हो सकते हैं पर इन सभी कारणों की उत्पत्ति ज्यादा बोलने से ही संभव होता है।
 ऐसा क्यों होता यह कोई नहीं जानता। है ना पर इस आर्टिकल में हम इसके बारे में कुछ ऐसे वैज्ञानिक और तार्किक उदाहरण देखेंगे जो बहुत हद तक इसके सवालों    से पर्दा हटा देगा। तो चलिए देर किस बात की जानते हैं यह जानकारी।





ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती और ना ही समाप्त ( Energy can not be generated nor ended ) 

    
    इस आर्टिकल को समझने के लिए यह नियम बहुत महत्वपूर्ण है। इसलिए इसको पहले जान लेते हैं। 
 इसे ऊर्जा संरक्षण का नियम कहते हैं। यह सर्वव्यापी नियम है यह हर स्थान, हर समय और हर प्रकार की वस्तुओं पर अनिवार्य रुप से लगता ही लगता है। इसके अनुसार अगर हम किसी भी वस्तु को ऊर्जा के रूप में बदले तो ठीक ऊतनी ही ऊर्जा मिलेगी जितनी की पहले वस्तु में थी। जैसे : अगर हम किसी वस्तु को जलाएँ तो इसकी ऊर्जा ( ऊष्मीय, प्रकाशीय, ध्वनि आदि ) कई रुपों में परिवर्तित हो सकती है पर कुल ऊर्जा नियत या एकसमान ही होगी। 
इससे यह पता चलता है हम जो भी बात बोलते उन सबकी ऊर्जा एक व्यक्ति से दूसरे और दूसरे से तिसरे व्यक्ति तक होते हुए हमेशा किसी ना किसी रूप में चलती रहती है पर समाप्त नहीं होती है । यही कारण है कि हम अपनी कही गई बातों में हमेशा फंसे रहते हैं क्योंकि बातें ऊर्जा हैं और ऊर्जा को समाप्त किया नहीं जा सकता है । और इस तरह से हमारी कही गई बातें ना जाने किस किस ऊर्जा में बदलती हुई एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में प्रवेश करती रहती है। 









 द्रव्यमान ऊर्जा का ही स्वरूप होता है । 

The mass of energy is the same form. 

       दुनियाँ में जो भी वस्तु है उसका कुछ न कुछ द्रव्यमान होता है। द्रव्यमान को ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है। जैसे किसी वस्तु को अगर जलाएँ तो उस वस्तु का द्रव्यमान मुख्यतः ऊष्मीय ऊर्जा में बदल जाता है। यह कोई परिकल्पना नहीं है बल्कि एक महान वैज्ञानिक की खोज है। 


   महान वैज्ञानिक आइन्स्टीन ने यह सिद्ध किया कि द्रव्यमान को ऊर्जा में बदला जा सकता है। क्योंकि द्रव्यमान ऊर्जा का दूसरा रुप है। उन्होंने इसका सूत्र भी दिया। 
E = mc2 

  जहाँ c = 3 × 108  मीटर / सेकण्ड. प्रकाश की चाल है। इस समीकरण को आइन्स्टीन का द्रव्यमान - ऊर्जा समीकरण कहते हैं। इस सूत्र से यह स्पष्ट हो रहा है कि किसी भी द्रव्यमान को पुरी तरह से ऊर्जा में बदलने के लिए ( अत्यधिक गति द्वारा ) 3 लाख किलोमीटर/सेकण्ड की चाल भी होना चाहिए। इतनी ज्यादा गति से लगभग हर प्रकार की वस्तुएँ अपने छोटे - छोटे टुकड़ों में बट जायेगी जो ऊष्मीय ऊर्जा के रूप में परिवर्तित होकर  संबंधित माध्यम विलीन हो जाते हैं और हमें दिखाई नहीं देते ।

  किसी  वस्तु को ऊर्जा में बदलने के लिए हमें बस उस वस्तु को किसी भी तरह से  उसके मूल कणों में बदलने की जरूरत होती है चाहे हम गति का उपयोग करते हुए करें या किसी अन्य तरिके से करें। 
इससे एक बहुत बड़ी बात सामने निकलकर आती है कि हमारा शरीर एक ऊर्जा ही है जो अपनी धीमी गति और शरीर कणों का एक साथ होने के कारण द्रव्यमान के रूप में दिखाई दे रहा है। इसका मतलब यह हुआ कि हम जो भी करते हैं या फिर सोचते हैं, बोलते हैं, सुनते हैं। ये सभी क्रियााएँ हमारे शरीर में ऊर्जा के रूप में ही कार्य को संपन्न होती हैं । और यही कारण है कि हम बोलना, सुनना, कहना, हवा का चलना आदि क्रियााओं देख नहीं सकते हैं क्योंकि ऊर्जा स्वयं दिखाई नहीं देती है लेकिन इससे होने वाली क्रियाओं को देखा या महसूस किया जा सकता है। अगर हम बिना कुछ खाये कोई भी काम करें तो हम दुबले - पतले हो जाते हैं। पता है क्यों क्योंकि हमारे शरीर का द्रव्यमान ऊर्जा में बदलने लगता है और हमारा वजन कम होने लगता है। अगर हम कोई काम ना भी करें सिर्फ चलें - फिरें, या बोलें तो भी हमें कुछ तो ऊर्जा चाहिए ही होगी।



ज्यादा बोलने से काम क्यों नहीं बनता ? 




   अब हम जाानते हैं कि हमारे  ( बढा़ चढ़ाकर ) बोले गये शब्द हमें कैसे असफलता देते हैं। हमने यह बात तो स्पष्टतः जान ली है कि हमारे शरीर में जो भी कुछ है या होता है, वो सब एक ऊर्जा है। तो इसका मतलब यह है कि हम जब कुछ करना चाहते हैं तो यह चाहत वाली ऊर्जा हमारे शरीर में प्रवेश कर जाती है पर जब हम इसी चाहत को अपने शब्दों में बयाँ करते हैं तो इस ऊर्जा में कमी होने लगती है। इस तरह हमारी यह चाहत कम हो जाती है और हम उस काम को या तो अच्छे से नहीं कर पाते हैं या कर ही नहीं पाते हैं। हमें उस काम को  सही से करने के लिए फिर से वही चाहत वाली ऊर्जा की जरुरत होती है। इसी बात को हम साधारण शब्दों में यह कहते हैं कि मेरा मन नहीं कर रहा है.. काम को करने का। हमारा मन किसी कार्य को करने को कहता है तो इसके पीछे एक इच्छा वाली ऊर्जा होती है जो मन को करने या उस वस्तु को पाने के लिए कहती है। पर जब हम इस इच्छा को शब्दों में बयाँ करते हैं तो यह ऊर्जा कम होने लगती है। लेकिन अब आप सोच रहे होंगे कि जब हम कुछ कहेंग ही नहीं तो कोई काम करेगें कैसे ? है ना !




   जिस प्रकार किसी भी वस्तु का एक सीमा ( लिमिट ) में हम उपयोग किया जाए तो वह सबसे उपयुक्त (  सही ) होता है। इसी प्रकार अगर हमारे मन में कोई इरादा / इच्छा है तो इसे ऐसे जगह पर प्रकट करना चाहिए जहाँ इसकी वाकई में जरूरत हो और हमें यही वाली ऊर्जा मिले यानी जहां हमें हमारे काम को समर्थन मिले ऐसी जगहों पर हमें अपनी बात रखनी चाहिए । बेवजह या बार - बार इसे सबके सामने न प्रकट करें क्योंकि ऐसा करने से आपकी यह इच्छा समाप्त होने लगेगी क्योंकि यह एक ऊर्जा है और इस इच्छा को प्रकट करने के लिए इसके ऊर्जा में कमी आ जायेगी। कमी आयेगी तो हमारे मन में इसका सीधा असर दिखाई देता है। जब इसकी ( इच्छा ) में कमी होगी तो वही काम अब करने को मन नहीं कहेगा।  पर इसका मतलब यह नहीं है कि इस इच्छा को बढ़ाया नहीं जा सकता है, बढ़ाय जा सकता है पर कैसे  ?


    ✴️ जानने के लिए निचे पढ़ते हैं.. 



 इच्छा वाली ऊर्जा को बरकरार कैसे रखें ? 

How to keep the energy you desire ?


          कोई भी इच्छा / मन का घटना - बढ़ना हमारे उपयोग पर निर्भर करता है। अगर कोई इच्छा घट रही है तो इसका मतलब यह है कि हम सिर्फ इस ऊर्जा का उपयोग तो कर रहे हैं पर इस ऊर्जा को बरकरार रखने के लिए कोई कार्य नहीं कर रहे हैं। जो इच्छा या चाहत हमारे अंदर है वो कहाँ से और कैसे आयी है यह पता करलो क्योंकि जब हमें इसकी जरूरत या कमी होगी तब हम यहाँ से इस ऊर्जा को लेकर अपनी इच्छा को फिर से बढा़ सकते हैं। जैसे हमें भुख लगती है तो हम खाना खा कर अपनी ऊर्जा बढा़ लेते हैं बिल्कुल ऐसे ही हमें अपनी मंजिल पाने के लिए अपनी जो भी अच्छी इच्छा या चाहत है उसे बार बार जगाना होगा या विज्ञान कि भाषा कहे तो में ऊर्जा की जरूरत होगी।


   अगर आप अपनी इच्छा को बहुत कम जाहिर करेगें तो भी उसे पुरा होने में कठिनाई आ सकती है। इसके निम्नलिखित कारण हो सकते हैं -

  • समय-समय पर इच्छाओं में बदलाव। 
  • किसी तीव्र इच्छा का उत्पन्न होना। 
  • इच्छा में कमी आना। 

इसलिए कहा गया है कि किसी भी काम को बिना उचित कारण कभी टालना नहीं चाहिए। 

   शायद इसीलिए बहुत से लोग अपने काम या इच्छा को बिना किसी को बताए ही करते हैं और वो सफल भी हो जाते हैं। पर कुछ काम ऐसे होते हैं जो बिना बताए किया भी नहीं जा सकता है। ऐसे काम को करना ही थोड़ा कठिन होता है। सबसे कठीन वह काम  होता है कि जिसे हम चैलेंज के साथ करने को कहते हैं। क्योंकि हम जब ऐसा कहते हैं तो उस समय हमारी भावना या इच्छा बहुत अधिक होती है और इसके चलते हम अपनी इस भावनात्मक ऊर्जा को अपने शब्दों द्वारा बाहरी वातावरण में जाने - अनजाने में ही कुछ ज्यादा ही व्यर्थ कर देते हैं। और जब यह ऊर्जा बाहर निकल जाती है तो हम शांत हो जाते हैं क्योंकि ऊर्जा में कमी आ जाती है और उस काम को करने के लिए मन नहीं करता है जिसे हम कह रहे थे। 


   हम सब इतना तो जानते ही हैं कि जो व्यक्ति जितना ज्यादा बोलता है वह उतना ही कम काम करता है और ऐसे व्यक्ति को हम अक्सर बड़ बोला, फेंकु, बहँसु आदि कहते हैं। इन सबके पिछे ऊपर के बताये गये कारण जिम्मेदार हो सकते हैं । 

    अधिकाशं लोग ऐसे भी होते हैं जो जान ही नहीं पाते हैं  कि असल में यह सब जो उनके साथ हो रहा है ये उनके गलत शब्दों या गलत जगह के बोलने के चलते हो रहा है। अगर साधारण शब्दों में कहा जाये तो लगभग 90% या इससे भी अधिक हमारे जीवन में गलत होने का कारण गलत जगह पर गलत शब्द को बोलना है। कुछ ऐसे ही शब्द देखते हैं कि ये भी ऊर्जा वाले कांसेप्ट फर खरा उतरता है कि नही। 








मैं यह काम जिंदगी में किसी भी कीमत पर नहीं करूँगा / करूँगी । 

I will never do this work in life.    




       जी हाँ अगर आप ऐसी कोई बात कहते हैं कि मैं यह काम तो किसी भी किमत पर और कभी नहीं करूँगा/ करूँगी तो यह बात आपका फ्लो ( पिछा करना ) करने   लगेगी  और   लगभग  90%  से  भी   ज्यादा संभावना है कि एक ना एक दिन वह काम आपसे करवाकर ही छोड़ेगी । दरअसल जब भी हम कोई ऐसी बात क्रोध, या घमंड से भरी ऊर्जा के साथ बोलते हैं वह ऊर्जा हमारे हाव - भाव तथा शब्दों के माध्यम से से हमारे शरीर के बाहर चली जाती है और हम ठीक इसके अगले ही पल क्रोध, गुस्सा से मुक्त हो जाते हैं। इस प्रकार की बातें हम जिससे कहेंगे उसको जरूर लगेगी ( उसके अंदर यह ऊर्जा  चली जायेगी ) और उस व्यक्ति के मन में विरोधाभास हो जाता है और यह ऊर्जा वह अपने पास रखना नहीं चाहेगा क्योंकि उसे यह ऊर्जा चुभेंगे जिसे जलन भी कहते हैं और जैसे ही मौका मिलेगा वह अपनी जलन को शांत करने के लिए उसे कुछ कहेगा या कुछ ऐसा करेगा जिससे इस जलन रुपी ऊर्जा को अपने अंदर से निकाल सके। तो इस तरह से भावनाएँ, चाहत या इच्छा एक स्थान से दूसरे स्थान तक ऊर्जा के रूप में आती - जाती हैं। 



 इसीलिए हमें कोई भी बात कहने से पहले एक बार जरूर सोचना चाहिए क्योंकि हम जो भी कुछ कहते हैं वो एक ऊर्जा होती है और यह ऊर्जा अपनी दिशा और दशा बदलती है पर समाप्त नहीं होती है, और इस बात से भी हमेशा बचने की कोशिश जरूर करें कि जब भी कोई बात कहें तो उसमें घमंड ना शामिल हो । क्योंकि अगर हम घमंड या क्रोध के साथ कोई भी बात करते हैं तो इस तरह की बातों में अत्यंत तीखी ऊर्जा होती है ( बिल्कुल सुई के समान चुभती है ) और इसी कारण से ऐसी बातें सुनते ही किसी को भी गुस्सा, क्रोध आ जाता है। जो आदमी ऐसी बातें सुनकर इस ऊर्जा को वापस नहीं करता है तो इसका मतलब यह है कि वह उस व्यक्ति को और क्रोधित नहीं करना चाहता है या उसके झगड़े में नहीं पड़ना चाहता है। लेकिन वह इस बात को सह नहीं सकता है और इस ऊर्जा को किसी अन्य के सामने जरुर निकालेगा या फिर खुद से बातें करके इस जलनरुपी ऊर्जा को व्यर्थ कर देगा। 







सीख : 1. ऐसी ऊर्जाओं का इस्तेमाल कर हम किसी बड़े काम को आसानी से करके जीवन में आगे बढ़ सकते हैं। 

2. कोई ऊर्जा बुरी नहीं होती है बल्कि हमारे उपयोग इन्हें अच्छा - बुरा बनाते हैं। 

इसलिए ऐसी ऊर्जा को व्यर्थ नहीं करना चाहिए। किसी अच्छे काम में इसका उपयोग करना चाहिए। ऐसा करने वाले ही आज उँची शक्शियत के मालिक हैं।




किसी काम को टालने वालो के लिए निचे अच्छी सीख है इसे भी पढ़कर हमसे अपने विचार जरुर शेयर करना। धन्यवाद... 




चलो यह काम कल तो हो ही जायेगा। 


क्या आप भी बहुत बार ऐसा कहते हैं तो आज से ही यह आदत सुधार लो क्योंकि ऐसे कामों का हो पाना लगभग मुश्किल हो जाता है । याद करिए आप सभी ने बहुत बार ऐसा जब कहा होगा तब वह काम किसी ना किसी वजह से जरूर रूक गया होगा। शायद इसीलिए यह कहा जाता है कि 

काल करे सो आज करे, आज करे सो अब, पल में परलय होगी बहुरी करेगा कब ।  "    

इसका मतलब साफ है कि हम अगर किसी काम को कल करने की बात करते हैं तो उसे आज ही कर लेना चाहिए ( अगर संभव हो तो  ) और जिस काम को हम आज करने की बात करते हैं उसे अभी के अभी करने की कोशिश करना चाहिए ।
दरअसल हम अगर कोई बात सोचते हैं या फिर कहते हैं कि यह... काम या वह... काम किसी अन्य समय में करेंगे तो क्या गारंटी है कि उस समय आप उस काम को करने के लिए आपके पास समय हो या फिर आप वहाँ हों जहाँ पर आपको काम था । यह भी तो हो सकता है कि आपको उसी समय कोई बड़ा और उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण और जरूरी काम आ जाये जिस समय में आपने एक काम सोच रखा था ।
 दरअसल हम जो काम या बात सोचते हैं केवल उसी बात या काम की संभावना नहीं होती है बल्कि उसके अलावा भी बहुत कुछ होता है जो होने वाला होता है। 

इस बात को सही से समझने के लिए मान लिजिए किसी प्रतियोगिता में दो लोग शामिल हैं और एक - दूसरे के आमने सामने हैं । यदि पहला प्रतियोगी दूसरे प्रतियोगी से यह कहता है कि यह प्रतियोगिता तो मैं ही जितुँगा तो यह बात स्पष्ट है कि दूसरा प्रतियोगी पहले प्रतियोगी को हराने की पूरी कोशिश करेगा क्योंकि अब उसे खुली चुनौती ( open warning ) वाली ऊर्जा मिल गयी है जो उसके मान - सम्मान को ठेस और जलन पैदा कर देती है। वह इस ऊर्जा को बाहर निकालने के लिए बेचैैनी के साथ अधिकतम प्रयास करेगा। अगर पहला प्रतियोगी कुछ भी नहीं कहता तो शायद दूसरा प्रतियोगी इतने जूनून के साथ प्रतियोगिता में भाग नहीं लेता  और ना ही जीतता।  यहाँ पर दूसरा प्रतियोगी के जितने की संभावना और बढ़ जाती है क्योंकि वह अब प्रतियोगिता जितने के लिए जी जान लगा देगा।  इस कहानी से एक बात स्पष्ट हो रही है कि अगर आप कोई ऐसी बात कहते हैं जिसमें घमंड, किसी को निचा दिखाना, अतिरिक्त विश्वास (over confident) आदि हो तो ऐसी बातों में जलन या विरोध वााली ऊर्जा अत्यंत तीव्र और प्रभावी होती है। यही कारण है कि ऐसी बाातें सुुनकर हर व्यक्ति जलन और क्रोध का शिकार हो जाते हैं।
निचे दिए गए शब्दों को जितना हो सके मत बोलिए :


  • किसी बात, वस्तु, अपने गुणों आदि पर घमंड करना। 
  • कल तो यह ... काम कर ही लेंगे  ( ओवर कान्फिडेंट के साथ  ) 
  • मुझसे बड़ा चालाक कोई नहीं । 
  • कोई भी परेशानी हो ही नहीं सकती, हुई या होगी । 








क्या आप जानते हैं जो लोग अच्छे खासे अमीर होते हैं फिर भी ऐसी बातें करते हैं कि आप सुनोगे तो आपको यही लगेगा कि अरे यह तो अच्छा खासा धनी है फिर बातें ऐसे कर रहा है जैसे कि यह तो बहुत ही गरीब हो। ऐसे लोगों के अमीर होने की कुछ बातें इस प्रकार है - - 
  • ये लोग अपने आपको बड़ा - चढ़ाकर नहीं बताते हैं। 
  • ये लोग अपने काम को टालते नहीं। 
  • ये लोग अपने बारे में बहुत ही कम जानकारी देते हैं। 
  • ये लोग प्रायः कम बोलने वाले होते हैं ।
  • ऐसे लोग स्वार्थी भी होते हैं। 
  • ऐसे लोग फेंकु नहीं बल्कि बटेरूँ होतें हैं। 



 ये लोग ऐसा क्यों बोलते हैं और इनके ऐसा बोलने पर इनको क्या फायदा होता है, इसका जवाब आपको मिल गया होगा । अगर आप में भी यह आदत आ जाये तो आप या हम सब अमीर बनने की एक सीढ़ी ऊपर चढ़ जायेंगे। 




माता-पिता अपने बच्चों की बडा़ई.. नहीं करते.... 

बहुत लोग यह सोचते हैं कि मेरे माता-पिता  मेरी बडा़ई क्यों नहीं करते हैं जबकि मैं तो बहुत अच्छा काम करता हूँ। दरअसल हर माता - पिता  अपने की तारीफ तो खुलकर करना चाहते हैं पर उससे पहले ज्यादा जरूरी यह होता है कि उनके बच्चे पर किसी की बुरी नजर ना लगे। और सत्य यह है कि बडा़ई तब करना चाहिए जब आवश्यक हो बिना मतलब यानी किसी के सामने अपने या अपने बच्चों की सराहना करना भारी पड़ सकता है। क्योंकि बिना आवश्यक की सराहना करना घंमड के दायरे में आता है। यह बात तो हम सब जानते हैं कि घमंड बहुत ही बुरी बात है यह बड़े से बड़े गुण को  नष्ट कर देती है । इसलिए हमारे माता-पिता  हमारी प्रशंसा बहुत कम करते हैं । इस बात से बहुत से लोग अपने माता-पिता  को यह कहने लगते हैं कि इनको मेरा कोई मोल ( मान )  ही नहीं है और भला - बुरा भी कहने लगते हैं ।  आशा है कि यह जानकारी आप सभी के लिए उपयोगी होगी ।



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