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संभावनाओं का सागर

13 Sep 2019

पक्षी या चिडिया झुंड में ही क्यों उड़ान भरते हैं ? वैज्ञानिक कारण by : Possibilityplus.in



 पक्षियों का झुंड में उड़ना, हमारे लिए जितना मनोरंजक लगता है उतना ही पेंचिदा यह लगता है कि यह ऐसे एक शानदार आकार में ही उड़ान क्यों भरते हैं। क्या इसके पीछे कोई कारण है ?
तो आप बिल्कुल सही है पर जवाब क्या है चलिए पढ़कर जानते हैं।



ये है Possibilityplus.in  साईट जहाँ आपको ऐसी जानकारियाँ पढ़ने को मिलती हैं जो आप चाहते हैं। अगर आपका कोई सवाल है तो हमें कमेेन्ट जरुर करें । धन्यवाद ! 




पक्षी झुंड में कब और क्यूँ उड़ते हैं ?  When and when the birds fly in   the flock ?

   पक्षि झुंड में तब उड़ान भरते हैं जब उन्हें अधिक दूरी तय करनी होती है। ऐसा क्यों यह सवाल उठना स्वाभाविक है। इसको जानने से पहले हमें यह भी जानना होगा कि यह आखिरकार इतनी अधिक दूरी तक क्यों करते हैं ?



इस सवाल का जवाब हम बड़ी आसानी से जान सकते हैं। जिस प्रकार से हम अपनी रोजी-रोटी के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक सफर करते हैं ठीक उसी प्रकार से ये पक्षियों का झुंड भी इधर-उधर अधिक दूरियाँ तय करता है । क्या हमें इतना पढ़ने के बाद यह महसूस हो रहा है कि हम पुरी तरह से यह जान चुके हैं कि असल वजह क्या थी ? 
तो आपका जवाब होगा नहीं, क्योंकि यह जानकारी अभी अधूरी है। 
             दरअसल पक्षियों का झुंड में उड़ने सबसे बड़ा और पहला का कारण यह है कि यह जल्दी थकते नहीं हैं और ज्यादा से ज्यादा दूरियाँ बिना रुके ही तय कर लेते हैं। इसके लिए वो अपनी स्थितियों को बदलते रहते हैं। झुंड में जो पक्षी सबसे पिछे है तो इसका मतलब यह है कि वह कम बल लगा रहा है और थोड़ा-सा थीमी गति से चल रहा है और थका हुआ है तथा जो पक्षी सबसे आगे है तो इसका मतलब यह है कि वह सबसे ज्यादा बल लगा रहा है और थकान से मुक्त है और अपने से पिछे वाले पक्षियों से थोड़ा तेज उड़ रहा है । पर कुछ दूरी तय करने के बाद सबसे आगे वाला पक्षी झुंड में सबसे पिछे चला जाता है और सबसे पिछे वाला सबसे आगे आ जाता है। इस तरह से पिछे के पक्षी कम बल लगाते हुए आराम से सभी पक्षियों के साथ - साथ अत्यधिक दूरियाँ तय करते हैं। 







पक्षी विशेष आकृति में ही क्यों उड़ान भरते हैं ? 

Why do birds fly in a special shape ?


    अब आती है बारी इनके विशेष आकृति के बारे में जानने की। हमें यह देखा होगा कि पक्षी 🐦 जब झुंड में उड़ते हैं तो वे हवाई जहाज के पंखों के जैसी आकृति बनाते हुए अधिकतर उड़ते हैं। इस प्रकार की आकृति  पर हवा का दबाव बहुत कम लगता है और पक्षियों के उड़ने में आसानी होती है।
     पर एक सवाल अभ भी यह उठता है कि आखिर पक्षियों को इसकी जानकारी कैसे पता है ?
दरअसल बात यह है कि पक्षियों को इसकी जानकारी नहीं होती है और जब वे झुंड में एकसाथ उड़ान भरते हैं और एकसाथ आगे बढ़ना चाहते पर जो पक्षी तेज और ऊर्जा से भरपूर होते हैं वे अधिक तेजी से उड़ते हैं पर जो इनसे कम तेज और कम ऊर्जावान होते हैं वे इतनी तेजी से ना उड़ पाने के कारण अपने आप ही पिछे खिसक जाते हैं।
इस तरह एक ऐसा आकार बन जाता है जिसकी इन्हें कोई जानकारी नहीं होती है। और हमें लगता है कि जैसे पक्षी यह सब सोंच समझकर ऐसा कर रहे हैं।





   जब पक्षियों की चाल अलग - अलग होती है तो वे एकसाथ कैसे आगे बढ़ पाते हैं ? 


   यह सवाल वैज्ञानिक के साथ जिज्ञासाओं वाला भी है। इसलिए  हमें इसके बारे में जानना चाहिए। इसको समझना भी आसान है। हम सभी यह बात भली भांति जानते हैं कि जब किन्हीं वस्तुओं की चाल में अन्तर है तो इसका मतलब यह है कि एक ही दूरी तय करने के लिए उन वस्तुओं को अलग - अलग समय भी लगेगा है। इस तरह से तो पक्षियों को एक ही स्थान पर जाने के लिए अलग - अलग समय में पहुँचेंगे। पर यहाँ पर तो पक्षियों का झुंड एकसाथ ही पहुते हैं ( उस  स्थान पर जहां वे जाना चाहते हैं )।
   हमने प्रायः सड़कों पर यह देखा होगा कि जब कोई तेज रफ्तार से जाती हुई गाड़ी किसी कागज या  हल्की वस्तु से होकर जाती है तो गाड़ी के खिचाव बल के कारण हल्की वस्तुएँ गाड़ी के पिछे खिंची चली जाती हैं। पर कुछ दूरी पर जाते - जाते रुक भी जाती हैं। जब ये हल्की वस्तुएँ बिना किसी गति के बाद भी गाड़ी के साथ कुछ दूरी तय करती हैं। अगर गाड़ी की गति या चाल से थोड़ा सा भी कम होती तो वस्तु की चाल या गति तो ये वस्तुएँ गाड़ी के साथ - साथ ही चली जाती ( गाड़ी की गति के सहारे ) ।




    यहाँ पर एक  बात यह भी स्पष्ट होती है कि जिसकी चाल कम होती है वह पिछे होती है और आगे वाली वस्तु की के बल से खिंची चली जाती हैं । जैसे इस उदाहरण में कम चाल वाली हल्कि वस्तुएँ गाड़ी के पिछे होती हैं। बिल्कुल इसी तरह से जिन पक्षियों की चाल कम होती है वे पिछे होते हैं और उन्हें कम बल और चाल से चलने से आराम मिलता है और एक साथ आगे बढ़ते जाते हैं। कुछ दूरी जाते-जाते जब आगे वाले पक्षियों की ऊर्जा और गति कम होती जाती है और वे अपने से पिछले से ही पिछे होते जाते हैं। और इस तरह से लगभग ^ आकार की आकृति बन जाती है इनके झुंड के कारण ।




  उम्मीद है कि आपको यह जानकर अब असल वजहों का पता चल गया होगा। अगर फिर भी कोई सवाल है तो कमेंट करें । धन्यवाद !  
By : Possibilityplus.in... 



12 Sep 2019

मात्रक कैसे पता करें किसी भी सूत्र का।


   इनके मात्रक बताओ :

  • वेग
  • चाल
  • त्वरण 
  • कार्य 
  • विद्युत धारा 
  • लम्बाई 
  • समय
  • क्षेत्रफल 
  • दाब 
  • बल





  इन सभी के मात्रक क्या हैं और कैसे इन्हें याद करना है इन सभी के बारे पुरी जानकारी 💡 दी गई है। यही नहीं बल्कि सभी व्युत्पन्न मात्रकों को याद करने की झंझट भी खत्म हो जायेगी। इन सभी सवालों को हमें जानने के पहले इनके बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ जानना परमावश्यक है। 





नोट : 
इस आर्टिकल को पढ़ने के बाद आपको कितना समझ में आया या फिर आपका कोई सवाल है तो कमेंट करें । धन्यवाद !


      विज्ञान हो या दैनिक जीवन हमें मात्रक का उपयोग करना ही पड़ता है। किसी वस्तु की सही मात्रा को बताने के लिए मात्रकों का उपयोग किया जाता है। किसी भी राशि का मान बताने के लिए हमें दो पदों की आवश्यकता होती है :
  1. राशि का संख्यात्मक मान (Numerical value) 
  2. मापन का मात्रक (Unit of measurement) 

उदाहरण : 2 मीटर, 5 किलोग्राम, 10 सेकण्ड, 15 जूल इन राशियों का आंकिक या संख्यात्मक मान 2, 5, 10, और 15 हैं और इनके मात्रक मीटर, किलोग्राम , सेकण्ड और जूल हैं। चलिए जीवंत उदाहरण देखते हैं। 
     
जैसे मान लिजिए : हमें 5 किलो  चीनी लेना है तो हमें " पाँच किलो " चाहिए या दो ऐसा दूकानदार से कहना पड़ेगा। तभी तो दूकानदार को यह पता चलेगा कि कितना सामान या चीनी चाहिए। अगर हम दूकानदार से यह कहें कि हमें पाँच चीनी दो या चाहिए तो इसका अर्थ यह होगा कि हमें चीनी के पाँच टुकड़े चाहिए। तो देखा आपने मात्रक का कितना महत्वपूर्ण स्थान होता है हमारे दैनिक जीवन में।









मूल राशियाँ तथा मूल मात्रक  Fundamental Quantities & Fundamental Units. 



    विज्ञान विषय को सरलता से समझने और याद करने की दृष्टि से विज्ञान में कुछ प्रचलित या बहुदा उपयोग में आने वाली राशियों को मूल राशि के रूप में स्वीकार किया गया है। ये सात प्रकार की हैं :

  1. लम्बाई या दूरी 
  2. द्रव्यमान 
  3. समय 
  4. ताप
  5. विद्युत - धारा 
  6. ज्योति तिव्रता तथा 
  7. पदार्थ की आण्विक मात्रा ( molecular quantity ) 


तो ये थी सात मूल राशियाँ । अब जानते हैं मूल मात्रकों के बारे में। 

मूल मात्रक की परिभाषा : वे मात्रक जिनका अलग - अलग स्वतंत्र रूप से निर्धारण किया जाये और जो किसी अन्य मात्रकों पर निर्भर ना हों मूल मात्रक कहलाते हैं। 


व्युत्पन्न मात्रक ( derived unit )  :  जो मात्रक एक से अधिक मूल मात्रकों से मिलकर बन होते हैं उन्हें व्युत्पन्न मात्रक कहते हैं।
जैसे : चाल = दूरी / समय
में दो मूल मात्रक मीटर / सेकंड है।




मात्रक पता करने का तरीका 

( Way to find unit ) 


    निम्न राशियों का मात्रक लिखिए :

  • वेग
  • चाल
  • त्वरण 
  • कार्य 
  • विद्युत धारा 
  • लम्बाई 
  • समय
  • क्षेत्रफल 
  • दाब 
  • बल


    वेग = विस्थापन / समय = मीटर / सेकण्ड
 विस्थापन दो  बिंदुओं के बीच की दूरी होता है। और दूरी का मूल मात्रक मीटर होता है। समय का मात्रक सेकण्ड होता है।चुँकि वेग का  का कोई मूल मात्रक नहीं होता है। इसलिए हम यहाँ पर विस्थापन और समय के मात्रक को ही उपयोग में लाते हैं। अगर इसका भी कोई मूल मात्रक तय किया जाये तो उसे भी याद करना होगा जो कि विज्ञान को और भी कठिन बना देगा। इसीलिए कुछ ही राशियों को मूल मात्रक बना दिया गया है। निचे सारिणी में मूूल राशियाँ और उनके मूल मात्रक दिए गए हैं। जिनकी मदत से हम इनमें से किसी भी राशि का मात्रक पता कर सकते हैं।
 इसी तरह चाल का मात्रक भी मीटर / सेकण्ड होता है।
त्वरण का मात्रक क्या होता है। इसको जानने के लिए इसका सूत्र हमें पता होना चाहिए।
त्वरण = वेग - परिवर्तन / समय
होता है। चुँकि वेग का मात्रक = मीटर / सेकण्ड होता है और समय का सेकण्ड होता है। इसलिए त्वरण का मात्रक = ( मीटर / सेकण्ड ) / सेकण्ड
         = मीटर / सेकण्ड 2
हो जाता है। सेकण्ड का सेकण्ड में गुणा होने की वजह से यह  सेकण्ड 2  हो जाता है।

   



मूल राशियाँ प्रतीक मूल मात्रक प्रतीक
लम्बाई L मीटर मी ( m )
द्रव्यमान M किलोग्राम किग्रा ( kg )
समय T सेकण्ड से( s )
ताप थीटा केल्विन या डिग्री सेल्सियस K या °C
विद्युत धारा A ऐम्पियर ए ( A )
ज्योति तीव्रता I कैण्डिला कै ( cd )
पदार्थ की आण्विक मात्रा Q मोल ( mole ) मोल ( mole )
 

31 Aug 2019

असफलता से सफलता पाने का अचूक मोटिव , by : Possibilityplus.in




                   ये पोस्ट असफलता से सफलता  पाने की ऐसी संभावना ( Possibility ) और ऊर्जा से भरपूर है जिससे हमें असफलता मिलने का भी डर नहीं रहेगा क्योंकि असफलता ही हमें सफलता का पथ प्रदर्शित करेगी।
 निचे दिए गए बिन्दुुओं को देखिए - 


  • असफलता ही सफलता का मार्ग दिखाती है।
  • असफलता ही सफलता का महत्व बताती है। 
  • असफलता की भी एक सीमा होती है। 
  • जितनी अधिक बार असफलता मिलती है सफलता मिलने की संभावना उतनी ही ज्यादा होती है।
  • असफल होना गलत नहीं है बल्कि असफलता के डर से प्रयास न करना गलत है।
  • असफलता और सफलता हमारे मन की उपज है।





 विशेेष : दुनियाँ का बड़े से बड़ा काम ही क्यों न हो और असफलता चाहे कितनी भी ज्यादा क्यों न मिली हो मगर उसमें सफलता की आखिरी उम्मीद कभी नहीं समाप्त होती है। अगर समाप्त होती है तो वह है हमारा प्रयास। 💎


   उपर्युक्त बिन्दुओं को देखते हुए यह पता चलता है कि असफलता और सफलता के बीच  एक गहरा संंबंध है। बल्कि यह कहना उचित होगा कि असफलता और सफलता दोनों ही एक ही  सिक्के के दो पहलू हैं। इसका मतलब यह है कि जहां असफलता होती है वहां पर सफलता का होना भी तय / निश्चित है। हम जानते हैं कि असफलता और सफलता दोनों  एक-दूसरे के विपरित हैं। शब्द असफलता से भी एक बहुुुत अच्छा उदाहरण निकलकर आता है और वह यह है कि इसका ( असफलता ) पहला अक्षर हटाने पर सफलता में बदल जाता है। याानी इससे यह स्पष्ट होता है कि असफलता में भी सफलता छिपी हुई है बस उसमें सुधार करने की जरूरत होती है।
 उपर्युक्त बिन्दुओं को सविस्तार से जानते हैं।









असफलता ही सफलता का मार्ग दिखाती है...

      दुनियाँ में असफलता को बहुत लोग या तो गलत मानते हैं या फिर असफलता पाना ही नहीं चाहते हैं। किसी भी काम में अगर हम असफल हो रहेें तो इसका मतलब यह है कि हमने जो तरिका अपनाया था सफल होने का नहीं बल्कि असफल होने का था। जिससे हमेें उसी काम को किसी अन्य तरिके से करने का विचार आता है। यहाँ से यह स्पष्ट होती है कि असफलता हमें  सफलता का मार्ग दिखाती है। हम किसी भी काम में जितना अधिक से अधिक बार असफल होते हैं तो हमें उसी काम में सफल होने की संभावना उतनी ही ज्यादा होती चली जाती है। एक स्ति्थि ऐसी आयेगी जब असफलता की संभावना ही समाप्त हो जायेगी और तभी असफलता भी हमारे आगे घुटने टेककर यह कहेगी कि अब तुम्हें असफल करने के लिए मेरे पास कोई प्रभावी संभावना ही नहीं बची है। अतः अब तुम सफलता प्राप्त कर सकते हो। इसे और बखूबी समझने के लिए हमें कोई जीवंत उदाहरण लेना चाहिए।


  1. थामस एल्वा एडिसन  :  एडिसन एक ऐसे वैज्ञानिक थे जिन्होंने इस दुनियाँ को असफलता का मतलब अपने शब्दों में इस तरह बयाँ  किया " मैं बैट्री बनाने में सैकड़ों बार असफल हुआ मगर इससे भी मुझे यह सीख मिली कि इन सभी तरिकों से बैट्री नहीं बनाई जा सकती है जो तरिके मैने अपनाये थे। "    एडिसन को बल्ब 💡का आविष्कार करने के लिए  दस हज़ार से भी ज्यादा बार असफलता मिली। पर वे जानते थे कि वह असफलता की सीढियाँ बनाकर सफलता को पा सकते हैं। एडिसन हर असफलता से कुछ न कुछ जरूर सीखते थे।   उन्हें यह अच्छी तरह से पता चल चुका था कि ये सारी असफलताएँ व्यर्थ नहीं हैं और आखिकार बल्ब 💡का आविष्कार करने में उन्हें सफलता मिल ही गई। मतलब गलती भी हमें सफलता के पथ को प्रदर्शित करती है यह बात तो स्पष्ट है। यहाँ पर एक बहुत जानदार और मोटिव वाला यह निष्कर्ष भी निकलकर सामने आता है कि असफलता चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो पर उसमे हमें सफलता की एक झलक अनिवार्यरूप से देखने को मिल ही जायेगी।  इसी को ही आखिरी उम्मीद  का नाम दिया गया है।  
  2. चींटी : चीटियों को हमने किसी ऊँचे स्थान पर चढ़ते हुए जरुर देखा होगा। ये उँचे स्थान पर चढ़ने के लिए ना जाने कितने ही प्रयास करती हैं। भले ही ये बार - बार असफल होती हैं मगर फिर भी चढ़ने का सिलसिला जारी रहताा है। ये चढ़ने के लिए इतनी ज्यादा कोशिश करती हैं कि इनके सफल होने की संभावना ही बढ़ जाती है और अन्त में वह उस उँचे स्थान पर चढ़ ही जाती हैं। 






  इस तरह से मिलने वाली सफलता का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान होता है 

   



असफलता की सीमा 

     

    दुनियाँ में लगभग हर वस्तु की या कार्य के होने की कोई न कोई सीमा जरुर होती है। तो जाहिर सी बात है कि असफलता की भी कोई न कोई सीमा जरुर होनी चाहिए जो सफलता पर जाकर समाप्त होती हो । जब हम असफलता की सारी संभावनाओं को अपने प्रयासों से समाप्त करते हैं तो हम सफलता और असफलता की सीमा पर पहुंच जाते हैं जहाँ से हम कहीं भी जा सकते हैं चाहे सफलता हो या असफलता। इसके बाद हम सफलता की ओर बढ़ सकते हैं क्योंकि हमारे पास अब असफल होने की कोई प्रभावी संभावना नहीं है। 
      इस बिन्दु पर ना तो सफलता मिलती और ना ही असफलता। इसे उदासीन बिन्दु भी कहते हैं। इसी बिन्दु पर वो लोग रहते हैं जो जितना सफल होते हैं वो उतना ही असफल भी होते हैं। इसे ऐसे समझिए अगर कोई व्यक्ति 500 रूपये कमाता है और वह इसमें से कुछ भी ना बचाते हुए सारा पैसा खर्च कर देता है। यानी वह कमाने से पहले जहाँ था वहीं खर्च करने के बाद फिर आ जाता है। 




असफल होना गलत नहीं बल्कि असफलता के डर से प्रयास न करना गलत है..


    यह लाईन भी बहुत प्रेरणादायी है और हमें इसे अपने दैनिक जीवन में अनिवार्यरूप से उपयोग में लाना चाहिए। इस बात को पढ़ने से ही हमें मोटिव(प्रेरणा)  मिलती है। तो सोचो इसे करने में कितना मोटिव और कामयाबी मिलेगी। यह सफलता की कुंजी है जो हमें यह बताता है कि असफल होना गलत नहीं है बल्कि इसके डर से कि  मैं दोबारा - तेबारा या बार - बार असफल हो जाउँगा तो क्या मतलब ऐसे प्रयास का और यही हमारी सबसे बड़ी गलती साबित हो सकती है जो हमें किसी भी काम में सफलता नहीं दिला पायेगी।




  यदि यही गलती करते हुए एडिसन ने अपने प्रयासों को बंद कर दिया होता तो आज उन्हें शायद कोई नहीं जानता होता। इसी तरह अगर चींटी भी बार - बार प्रयास न करती तो वह भी शायद कभी किसी उँचे स्थानों पर नहीं चढ़ पाती और हम सब चींटियों का बखान नहीं करते। 
  ऐसे तमाम किस्से भरें पढ़ें हैं जो इसकी पुष्टि करते हैं कि " असफल होना गलत नहीं बल्कि असफलता के डर प्रयास न करना गलत है। "



पुरा आर्टिकल पढने के बाद असफलता और सफलता की ये बातें सामने आ रही हैं -

  1. सफलता का मार्ग असफलता से होकर ही जाता है। 
  2. बिना असफलता के कोई भी सफलता नहीं मिलती। 
  3. हम असफलता के कारण असफल नहीं होते बल्कि प्रयास न करने से असफल होते हैं।
  4. प्रयास ही सफलता का मुख्य मोटिव है। 


             यह आर्टिकल पढ़ने के बाद आपको मोटिव ( प्रेरणा) मिला या नहीं, कमेंट जरूर दें।
Thanks for Reading. 
By : Possibilityplus.in


24 Aug 2019

सपने में कैसे पता करें कि हम सपने में हैं, क्या है सपने का राज , सिर्फ Possibilityplus.in पर..





  • क्या आप सपने देखते समय यह जानते हैं कि आप सपने में हो ?
  • क्या हम सपने में कहीं भी उड़ते हुए जा सकते हैं ? 
  • क्या हम अपने अनुसार सपने देख सकते हैं ? 
  • क्या सपने से कोई जानकारी हासिल की जा सकती है ? 


तो जानने के लिए हमें यह आर्टिकल पुरी तरह से पढ़ना होगा और पढ़ने के बा..द  आप यह आर्टिकल अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करें। 


यह जानकारी हमारे शूक्ष्म शरीर यानी आत्मा से संबंधित है। 
 शरीर से आत्मा दो स्थितियों में निकलती है - 

  1. गहरी नींद में और
  2. दूसरे मरने पर। 
पर इन स्थितियों में बहुत बड़ा फर्क होता है। सपने में आत्मा स्वेच्छा से किसी काम आदि के लिए निकलती है पर जब शरीर इसकदर बेकार हो जाती है कि आत्मा का निवास स्थान भी रहने लायक न रह जाये तो आत्मा को ना चाहते हुए भी शरीर से निकलना पड़ता है। 

हम यह जानकारी www.possibilityplus.in पर पढ़ रहे हैं।

    क्या हम सपने मनचाहे जगह जा सकते, उड़ सकते हैं, या कोई भी जानकारी पता कर सकते हैं तो कैसे इन सभी सवालों को आप उत्तर से भगा पाओगे। तो चलिए पढ़ते ये आर्टिकल।

   आत्मा शरीर की जान होती है। इसके बिना हमारा शरीर मृत समान हो जाता है। अपनी जिंदगी में लगभग हर व्यक्ति कभी न कभी यह महसूस किया होगा कि अचानक निंद टूट जाती है और हमारा शरीर हीलता - डोलता नहीं है। यह वह स्थिति है जब हमारी आत्मा हमारे शरीर में नहीं होती है पर हमें यह जानकारी होती है कि हम जाग चुके हैं। ऐसे समय में हमें झुनझुनी महसूस होती है। 
कुछ लोग इसी क्रिया को भूत 💀 या सैतान द्वारा पकड़े जाने की बात कहते हैं पर यह गलत है। चलिए अब उस सवाल की तरफ बड़ते हैं। 




  शरीर से आत्मा कब, कैसे और क्यों निकलती है ?  

       दरअसल  हमारे शरीर से आत्मा हर रात या दिन को गहरी नींद में होने पर निकलती है। आखिर क्या कारण है कि ये गहरी नींद में शरीर से बाहर निकल जाती है।



      दरअसल जब हम जाग रहे होते हैं तो हमारा मन और मस्तिष्क चलता या काम करता है। जागने के दौरान हमारे मन में जो भी बातें होती हैं। वह चलती रहती है जबतक वह पुरा ना हो जाए। जागते समय हमारे दिमाग में बहुत सारे अनचाहे या बिना सोचे काम चलते या होतें हैं, जैसे - चलना, बोलना, सोचना या कोई काम करना। इन सभी कामों में हमारे मन और मस्तिष्क की शक्ति बँट जाती है । पर जब हम गहरी नींद में सो रहे होते हैंं रैखिक तो हमारी इच्छाओं का रेला ही रहता है और हमारी बड़ी शारीरिक क्रियाएँ बंद या रुक जाती जैसे - सोचना, हिलना - डोलना आदि। इस वजह से हमारी सारी ऊर्जा हमारे शूक्ष्म शरीर यानी आत्मा को मिल जाती है। इस वजह से हमारी आत्मा की ऊर्जा बड़ जाती है और वह कहीं भी आ या जा सकने में सक्षम हो जाती है। इस दौरान जो ईच्छा सबसे ज्यादा होती है वैसा ही स्वप्न ( सपना ) हमें दिखाई देता है।


यहाँ पर एक रोचक बात यह है कि हमारी आत्मा कहीं भी आ या जा सकती है और हमारी शरीर से संबंधित रहती है। चाहे यह शरीर से कितनी ही दूर क्यों न हो पर हमें आत्मा द्वारा देखे गये सभी दृश्य स्पष्ट दिखाई देता है। यह कैसे होता है ?
   इसका सबसे अच्छा उदाहरण मोबाईल है। हमारा मोबाईल हमारे पास रहते हुए भी दुनिया के किसी भी कोने में मौजूद दृश्य को दिखा देता है जब वह किसी अन्य मोबाईल से आनलाइन संबंधित होता है। दरअसल दूसरे वाले मोबाइल से संबंधित होने के कारण उसकी बहुत सारी गतिविधियाँ देखी जा सकती है। इसी तरह हमारी आत्मा जिसे शूक्ष्म शरीर भी कहते हैं यह जो भी देखती या करती है वह सभ हमें दिखाई देता है।
   तो इस तरह शरीर से आत्मा बाहर निकल जाती है। 





सपने में जो मन चाहे करना..


        क्या आपने यह कभी सोचा है कि हम सभी अपने सपने जो चाहे वह कर सकते हैं। ( इसका मतलब इससे मत लगाना की हम किसी की कोई वस्तु ले सकते हैं जो हमारी वास्तविक दुनियाँ में है बल्कि इसका यह मतलब यह है कि हम सिर्फ जानकारी ले सकते हैं जो चाहते हैं पर कोई वस्तु नहीं ) यही कारण है कि ऋषि और मुनी अपनी सभी शारीरिक क्रियाएँ कम कर अपनी आत्मा को कहीं भी ले जाते थे। और अपनी जो भी इच्छा सबसे ज्यादा होती थी उसे पुरा करने के लिए ध्यान करते थे और सम्बन्धित जाानकारी प्राप्त करतेे थे। यही नहीं जिस तरह से एक मोबाईल को दूसरे मोबाईल को कनेक्ट करते हैं चाहे इनके बीच कितनी ही दूरी क्यों ना हो। बिल्कुल इसी तरह से ऋषि मुनि अपनेआप को भी भगवान से कनेक्ट करके वार्ततालाप करते थे। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि हम ऐसा करेंगे कैैसे क्योंकि जब हम सपने देखते हैं तो हमें यह भी नहीं पता  होता है कि हम सपने में हैं। हमें यह सब सच लगता है। पर एक बात हम मिस ( छोड़ना ) कर रहे हैं और वह यह है कि ऋषि मुनि लोग ऐसा तब करते थे जब वह सो नहीं रहे थे बल्कि ध्यान में होतेे थे। इसकेे लिए वह किसी एकान्त स्थाान पर जहाँ शाांति हो ऐसा स्थान ढूढते थे।
   अब आपके मन यह सवाल उठ रहा होगा कि हम कैसे ऐसा करें ? है ना तो इस बात को जानने से पहले हमें ऊपर दिए गए उदाहरणों को समझना बहुत जरूरी था इसलिए इन्हें शामिल किया गया है। चलिए हम सब कब, कैसे यह कर सकते हैं पढ़कर जानते हैं।





     ऐसा करने के लिए ये निम्नलिखित बातें आवश्यक हैं - 
  1. सपने में मनचाही बातें जैसे - उड़ना, कहीं पर जाने आदि के लिए सुबह 3 - 4 बजे जागना होगा। 
  2. जागने के बाद हमें जो भी काम सबसे ज्यादा पसंद हो उसके बारे में सोचते हुए फिर से सोना है। 
  3. इसके बाद हमारा शरीर धिरे - धिरे हमें महसूस होना बंद और झुनझुनी ( जैसे जागते समय हाथों और पैरों में होती है ) शुरू होने लगता है। 
  4. अब अगर हम उड़ाना या कहीं जाना चाहते हैं तो इसी समय कर सकते हैं। बस सोचना होगा और वैसा होने लगेगा। और यह सब आपको एकदम सचका अहसास दिलाएगा। 
  5. ऐसा करते समय आपको एकदम फ्री मतलब आपको कोई disturbe ना करें। यह बात बहुत जरूरी है। ज




    ऐसा करने के बाद आप अपने अनुभव हमसे जरूर शेयर करें। हमें बड़ी खुशी होगी। और साथ साथ 

आपको यह पोस्ट / आर्टिकल कैसा लगा जरुर शेयर करें। धन्यवाद... by : Possibilityplus.in



13 Aug 2019

ऊष्मा संचरण / प्रकाश की यह जानकारी नहीं जानते होंगे !




  • क्या प्रकाश को रोका जा सकता है ? 
  • क्या प्रकाश की चाल बदलती है ? 
  • प्रकाश कितने रंगों से मिलकर बना है ? 
  • प्रकाश की चाल की कितनी होती है ? 







     ऊष्मा संचरण की तीन विधियाँ होती हैं -

  1. चालन
  2. संवहन 
  3. विकिरण 




    क्या हम जाानते हैं कि इन तीनों विधियों में वह कौन - सी मुुख्य वजह है जिसका होना अनिवार्य है। इसका मतलब यह है कि बिना इसके ऊष्मीय ऊर्जा का संचार होना संभव नहीं है। तापान्तर ही वह मुख्य वजह है जिसके कारण ऊष्मा का संंचार या आदान-प्रदान होता है। 
              यह पोस्ट ज्ञान की दृष्टि से बड़ा महत्वपूर्ण है। सबसे पहले हम ऊपर दी गई तीनों विधियों की पुरी जानकारी ले लेते हैं। 




       परिभाषाएँ   

   चालन ( Conduction )

          यदि किसी वस्तु में एक स्थान का ताप 🔥 अधिक और उसी वस्तु के दूसरे स्थान का ताप 🔥 कम है तो अधिक ताप वाले कण के नजदीक कम ताप वाले कण की तरफ ऊष्मीय ऊर्जा  प्रवाहित या संचरित होती है।






   संवहन (  Convection ) 

             किसी तरल पदार्थों ( द्रव और गैस ) में यदि किसी स्थान का ताप अधिक हो तो घनत्व में कमी हो जाने से तरल ऊपर उठता है और कम ताप ( अधिक घनत्व ) का तरल उसका स्थान ले लेता है। यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कि सम्पूर्ण तरल एक ही ताप पर न हो जाए। इस क्रिया में तरल  पदार्थ के कण स्वयं स्थानांतरित होकर ऊष्मा का संचरण करते हैं। 








विकिरण ( Radiation )

              अधिक ताप की वस्तुओं से कम ताप की वस्तुओं को विधुत - चुम्बकीय तरंगों के रूप में ऊष्मा स्थानांतरित होती है। इन विकिरणों की प्रकृति प्रकाश की प्रकृति से मिलती - जुलती है। इन्हें अवरक्त विकिरण भी कहते हैं। इनके संचरण के लिए किसी पदार्थ माध्यम की आवश्यकता नहीं होती है।

उदाहरण : जैसे सूर्य से पृथ्वी तक  ऊष्मा, ऊष्मीय विकिरण द्वारा ही पहुँचती है।
पर,
विकिरण ऊष्मा संचरण का एक ऐसा तरीका है जो वातावरण में मौजूद अतिसूक्ष्म कणों के द्वारा संचरित होती है। अब आप शायद यह सोच रहे होंगे कि विकिरण के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती है तो माध्यम और कण कहाँ से आ गया। चुँकि हमने पोस्ट के शुरूआत में यह पढ़ा था कि ऊष्मा संचरण के लिए तापान्तर की आवश्यकता अनिवार्य होता है। जिसके लिए कोई भी माध्यम तो चाहिए ही जो ऊष्मा को एक स्थान से दूसरे स्थान तक लेकर जाये। वायुमंडल ( हवा ) ऐसे ना जाने कितने ही कण हैं जो हमें दिखाई भी नहीं देतेे हैैं।
जैसे  : हमारी आवाज 🔉 भी वातावरण में मौजूद शूक्ष्म कणों द्वारा ही होती है, मोबाइल का सिग्नल भी वायु मे उपस्थित कणों द्वारा ही होती है । चलिए कुुछ रोचक और मजेदार जानकारियाँ देखते हैं, जो हमें किताबों में भी शायद ही पढ़ने को मिले।
          सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी 14 करोड़ 50 लाख किलोमीटर है। अब क्या यह possibility( संभावना ) है कि बिना किसी माध्यम के प्रकाशीय ऊर्जा पृथ्वी तक पहुंच सके। हमने ऊपर 👆 पढ़ा है कि ऊष्मीय ऊर्जा बिना अन्तर के एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं पहुंच सकती है। इसलिए प्रकाश को सूर्य से पृथ्वी तक आने में या जाने के लिए इनके ( सूर्य और पृथ्वी ) बीच  ऊष्मीय ऊर्जा में अन्तर अनिवार्य है, परन्तु ऐसा नहीं है क्योंकि जब दो प्रकाश एक दूूसरे से लम्बवत होकर जाते हैं तो ये उनके उजाले में कोई कमी नहीं होती है। इसका मतलब यह है कि प्रकाश ऊष्मा के कारण नहीं संचरित होता है बल्कि सच्चाई यह है कि प्रकाश के मार्ग में अगर कोई ऐसी वस्तु आती है जो प्रकाश को रोकती हो तो प्रकाश के कण उस वस्तु  को टक्कर मार मारकर गर्म करदेते हैं। इसलिए ऊष्मा और प्रकाश दोनों में बहुत अन्तर है।
 निम्नलिखित बातें  सामने आती हैैं -

  •  सूर्य के प्रकाश और ऊष्मा के मार्ग में यदि कोई इससे अधिक ऊष्मीय ऊर्जा हो तो सूर्य का प्रकाश इससे होकर जा सकता है, पर ऊष्मा नहीं जा सकती है। 
  • प्रकाश के लिए ऊष्मीय अन्तर होना जरूरी नहीं जबकि ऊष्मा संचरण के लिए इसके मार्ग में ऊष्मा में अन्तर होना चाहिए। 
  • विकिरण ऊष्मीय ऊर्जा  की चाल प्रकाश की चाल   3 × 108 मीटर / सेेकंड  के बराबर है। 
  •  प्रकाश की चाल ठंडे या अधिक घनत्व वाले माध्यम में कम होती है ( जैसे : जल में ) जबकि ऊष्मा की चाल ठंडे माध्यम में अधिक और गर्म माध्यम में कम होती है। 






व्यवहारिक जीवन में उपयोग। 

Use in practical life. 


  1. रात्री या अन्धेरे में मोबाइल या टीवी देखते समय हमें कोई लाईट या बल्ब 💡 जलाकर रखना चाहिए जिससे कि मोबाइल या टीवी से निकलने वाली रोशनी आँखों में ना लगे। 
  2. रात्री को सोते समय भी कोई ( हल्का ) उजाला जरूर रहने दें जिससे शरीर की ऊष्मीय ऊर्जा बनी रहे ( ठंडी के मौसम में ) । 
  3. रात्री में सोते समय यदि लाईट को बंद करें तो गर्मी थोड़ी कम  लगती है। 







  अगर हम रात के अंधेरे या दिन में भी किसी अंधेरे में मोबाइल का इस्तेमाल अधिक से अधिक करते हैं तो मोबाइल की स्क्रिन से निकलने वाला प्रकाश आपकी आंखों पर लोड डालेगा और इसमें उपस्थित ऊष्मीय ऊर्जा आंखों को गर्म कर देगी । इस तरह सरदर्द और फिर आंखों में समस्या का होना शुरू हो जायेगा।
  अगर यह मोबाईल या टीवी का इस्तेमाल हम कुछ उजाले में करते हैं तो बहुत हद तक हम इन परेशानियों से छुटकारा पा सकतें हैं।




     यह आर्टिकल आपको कैसा लगा। इसके बारे में कोई राय या सुझाव हो तो अवश्य कमेंट बॉक्स में लिखें। धन्यवाद.. 


15 अगस्त 1947 को कौन सा दिन था ?

                       हम सभी को यह पता होता है कि 15 अगस्त 1947 को हमारा देश ( भारत ) स्वतंत्र ( Independence ) हुआ था। पर हममें से कुछ लोग ही यह जानते होंगे कि 15 अगस्त 1947 को कौन - सा वार ( दिन ) था।




हमारा प्यारा भारत को ( 15 अगस्त 1947 )  शुक्रवार को स्वतंत्रता का अधिकार हासिल करने में कामयाबी मिली थी। शुक्रवार का संंधि - विक्षेद करें तो हमें ये शब्द मिलते हैं -
शुक्रवार =  शुक्र  +  वार
शुक्र  = शुक्र ग्रह
वार   =  दिन
होता है।



15 अगस्त 1947  को कौन - सा  दिन था ?


    15  अगस्त 1947 को कौनसा दिन था यह मोबाईल में मौजूद कलेंडर की मदद से देख सकते हैं पर अगर हमसे यह जानकारी बिना कहीं से देखे पता करनी हो या परिक्षा में ऐसा कोई सवाल आये तो हम क्या करेंगे ? तब तो हमें परेशानी होगी है ना इसी स्थिति को देखते हुए यह पोस्ट बनाया गया है। 







पता करने की विधि :


           15 अगस्त 1947 से 15 अगस्त 2019 के बिच के दिनों की संख्या ज्ञात करके से भाग करके यह देखना है कि शेषफल क्या आ रहा है ?

15.8.1947 और 15.8. 2019 के बिच दिनों की संख्या = 72 वर्ष + 18 दिन 
18 दिन लीप वर्ष का है। चुँकि हर चार वर्षों में एक लीप वर्ष होता है। इसलिए 72वर्षों में कुल लीप वर्ष  18 होगें । 
     चुँकि 1 वर्ष = 365 दिन होता है। अगर इसमें 7 से भाग करें तो शेष 1 आता है। तभीतो हर अगला वर्ष एक दिन आगे से शुरू होता ( लीप वर्ष को छोड़कर ) है। जैसे - माना किसी वर्ष 1 जनवरी को सोमवार है तो इसके बाद वाले वर्ष की 1 जनवरी को मंगलवार होगा ( यदि पहला वर्ष लीप न हो तो ) । जैसे : 2018 - 019.
इस तरह 72 वर्ष को 72 दिन मान सकते हैं। 72 और 18 का योग = 90 
90 में 7 से भाग करने पर शेष 6 मिला है। इसका मतलब 15 अगस्त 2019 से 6 दिन आगे ( या 1 दिन पिछे ) वाला दिन (  गुरुवार/वृहस्पतिवार ) ही 15 अगस्त 1947 का है।






दिन पता करनी की पुरी जानकारी के लिए इसे पढ़ें 👉   किसी भी तारीख को दिन कैसे जाने ?    


 आपको यह जानकारी कैसी लगी जरूर बताएँ ! 

Thanks by : Possibilityplus.in

12 Aug 2019

इन्द्रधनुष कब, कहाँ , क्यों और कैसे बनती है, आसमान में ?

 

   इन्द्रधनुष का आकाश में बनना जहाँ एक तरफ पर्यावरण की सुन्दरता को बयाँ करता है तो वहीं दूसरी तरफ इसके बारे में जानने की जिज्ञासा भी उत्पन्न होती है। इन्द्रधनुष कब, कहाँ, क्यों और कैसे बनती है इन सभी सवालों का जितना महत्व है उतना ही महत्व इस बात का भी है कि यह गोलाकार में ही क्यों बनती है। इन सभी सवालों का जवाब हम इस पोस्ट में खंघालेंगे।





    इन्द्रधनुष का आकाश में बनना..

      हल्की-फुल्की बारिश या बारिश के बाद आकाश में पानी की कुछ बूँदों की मौजूदगी में सूर्य की किरणें जब इनपर पड़ती है तो ये किरणें अपने अलग - अलग तरंदर्घ्य के कारण प्रकाश सात रंगों में अलग- अलग हो जाता है। इस तरह इममें सात रंग होते हैं। चूँकि यह धनूष के आकार की होती है और यह इन्द्र के धनुष जैसी सुन्दर होती है। इसलिए इसे इन्द्रधनुष के नाम से जाना जाता है। 



यह तो इन्द्रधनुष बनने की संक्षिप्त जानकारी है जिसकी वजह से निम्नलिखित मुख्य सवाल छूट जाते हैं - 
  1. यह गोलाकार में क्यों बनती है ?
  2. प्राकाशरुपी इन्द्रधनुष को बनने की पुरी जानकारी ? 
  3. बारिश में कभी-कभी देखने को ही क्यों मिलती है ? 




 इन्द्रधनुष बरसात के मौसम में ही बनती है। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि इसके बनने की वजह पानी है। अगर ऐसा न होता तो यह हर मौसम में बनती। वैसे अगर आप भी इन्द्रधनुष बनाना चाहते हैं तो किसी भी मनचाहे मौसम में बना सकते हैं। इसके बारे हम आगे पढ़ेंगे। इसलिए अन्त तक जरूर पढ़िएगा।




इंद्रधनुष क्यों बनती है 


         इंद्रधनुष के बनने का कारण है वर्ण - विक्षेपण ( Dispersion )  । वर्ण - विक्षेपण क्या है, परिभाषा देखिए ➡️ 

वर्ण - विक्षेपण :  श्वेत प्रकाश - किरण का अपने अवयवी ( सात ) रंगों की प्रकाश - किरणों में विभाजित या अलग होना वर्ण - विक्षेपण कहलाता है। 
    वर्ण - विक्षेपण क्यों होता है यह जानना भी जरूरी है। 






प्रकाश का वर्ण - विक्षेपण क्यों होता है ? 

      श्वेत ( सफेद ) प्रकाश सात रंगों से मिलकर बना है और सभी रंंगों की विचलन या मुड़ने की क्षमता अलग - अलग होती है। इसी वजह से जब श्वेत प्रकाश को किसी विचलन भरे हुए मार्ग से गुजारते हैं ( जैसे - प्रिज्म, पानी की छोटी बूँदें आदि। ) तो सभी रंग अपने विचलन अंतर के कारण से अलग - अलग प्रदर्शित होने लगते हैं। 




नोट : वास्तव में प्रकाश के ☀ सात रंग ( अलग - अलग ही होते ) हैं पर इनके बीच दूरी इतनी कम होती है कि इनको अलग - अलग ( नंगी आँखों से ) देखना मुश्किल होता है। लेकिन जब यही प्रकाश किसी प्रिज्म या पानी की छोटी बूँदों से होकर गुजरता है तो इनमें दूरियाँ या अन्तर बढ़ जाता है और हमें स्पष्टतः दिखाई देने लगता है। 




 इंद्रधनुष गोल आकार में ही क्यों बनती है ?


         इन्द्रधनुष का गोल आकार में बनना भी एक महत्वपूर्ण सवाल है। इस सवाल का उत्तर बहुत कम लोग ही जानते हैं। पर Possibilityplus.in आपको उन सभी सवालों के जवाब मिलेंगे जो आप जानना चाहते हैं।
दरअसल सूर्य का प्रकाश अर्धवृत्ताकार या 360° का कोण बनाते हुए गति करता है ऐसा निष्कर्ष प्रकाश के वर्ण - विक्षेपण  होने  के बाद निकल रहा है ।

 हम स्पष्टरुप से यह देख रहे हैं कि सातो रंगों में अलग - अलग विचलन है जो इन्हें अलग करता है। इसका मतलब यह हुआ कि ये सातों प्रकाशीय रंग एक साथ होते हैं पर पर फिर भी अलग होते हैं। अतः स्पष्टतः हम यह कह सकते हैं प्रकाशीय ऊर्जा अर्धवृत्ताकार पथ बनाते हुए चलता है।
   वृत्ताकार के सबसे बाहरी भाग पर लाल और सबसे आन्तरिक भाग पर बैगनी होता है। इनके अलावा और पाँँच रंग  नारंगी, पीला, हरा, आसानी और नीला। जो लाल और बैगनी दोनों के बीच में होते हैं। और यही वजह है कि इन्द्रधनुष का रुप भी अर्धवृत्ताकार अथवा गोल होता है। 




इन्द्रधनुष कैसे उत्पन्न करें ?

अभी तक हमने इन्द्रधनुष कब, कहाँ और कैसे बनती है ऐसे सवालों को जाना। पर अब हम इन्द्रधनुष कब, कहाँ और कैसे बनती इसके बारे में जानकारी बटोरेंगे। इन्द्रधनुष को बनाने के लिए तीन शर्तें हैं -
  1. सूर्य का प्रकाश 
  2. पानी के फव्वारे ( अत्यंत शूक्ष्म बूँदें )
  3. छाया





     इन्द्रधनुष को बनाने के लिए ऐसी जगह ढूँढे जहाँ सूर्य का प्रकाश और छाया दोनों का एक स्थान पर संगम या मिलान बिन्दु हो। प्रकाश और छाया के केंद्र बिंदु पर मुँह या किसी अन्य तरिके के पानी का फव्वारा ⛲ बनायें। आपको फव्वारे के आसपास छोटी सी इन्द्रधनुष बनती हुई दिख जायेगी। सूर्य का प्रकाश जितना तेज़ होगा इन्द्रधनुष उतनी ही स्पष्ट होगी। इसके लिए दोपहर का समय सबसे सही होता है। 




     आपको यह जानकर कैसा लगा जरुर बताएँ क्योंकि आपके कमेंट के आधार पर ही हमें कुछ नया करने की प्रेरणा मिलती है।.
धन्यवाद...by: Possibilityplus.in


1 Aug 2019

केले 🍌 का पेड़ पानी में क्यों नहीं डूबता ?





Www.possibilityplus.in पर आप सभी का स्वागत है। इस आर्टिकल में हम केले के पेड़ का पानी में ना डूबने के कारण को जानेंगे।



नोट : इस साइट पर ऐसी जानकारियाँ मिलती हैं जो हमारे दैनिक जीवन में उपयोगी होती हैं पर हम उनके बारे में पुरी तरह से नहीं जानते हैं।  अगर आप ऐसी कोई जानकारी जानना चाहते हैं तो कमेंट बॉक्स में लिखकर जरुर पूछें।  धन्यवाद......




 केले 🍌 का पेड़ पानी में क्यों नहीं डूबता ?


    केले का पेड़ पानी में क्यों नहीं डूबता ? यह प्रश्न वैज्ञानिक, तार्किक,  उपयोगी और मजेदार भी है। इसके ना डूूबने की वजह है इसके अन्दर मौजूद पानी की मात्रा। जी हाँ पानी की मात्रा ही वह असल वजह है जो इसे पानी या जल के अंदर डूबने से बचाता है।
        यह उत्तर मोटे तौर पर पर जो यह तो बता रहा है कि किसके कारण ऐसा होता है, मगर हमें बात हजम नहीं हो रही है अथवा पुरी तरह से समझ में नहीं आया है। चलिए सरल और वैज्ञानिक तरीके से समझते हैं।


    स्पष्टीकरण :  पानी  में कोई वस्तु डूबेगी या नहीं यह दो ✌️ बातों पर निर्भर करता है -

पहली बात : वस्तु का घनत्व। 
दूसरी बात : वस्तु की आकृति 


पहली बात के अनुसार 

      पहली स्थिति के अनुसार यदि जिस भी वस्तु का घनत्व पानी के घनत्व से अधिक होगा वह वस्तु पानी में अंदर चली जायेगी अथवा डूब जायेगी। 

इसके विपरीत अगर वस्तु का घनत्व कम हो तो वस्तु पानी में नहीं डूबेेगी ( थोड़ा - बहुत हिस्सा ही जल के अंदर रहेगा ) बल्कि पानी के ऊपर तैरेगी। 


और अगर वस्तु का घनत्व पानी के घनत्व  के बराबर हो तब वस्तु पानी में डूबती हुई तैरेगी। 
       चुंँकि केले के पेड़ में लगभग 88 % तक पानी / जल ( water 💦 ) होता है । इसके अलावा एक द्रव ( लगभग 10% ) होता है जो पानी से भी हल्का होता है।  इसलिए केला हल्का - सा  डूबतेे हुए तैरता है जल / पानी में। 




दूसरी बात के अनुसार

       यदि अधिक घनत्व वाली वस्तु को विशेष आकृति में बनाया जाये तो यह पानी में नहीं डूबेगी। जैसे जब वस्तु को अधिक से अधिक क्षेत्रफल में फैला दिया जाता है तो वस्तु द्वारा पानी पर लगाया बल पानी के  उत्पेक्ष बल ( ऊपर की ओर लगने वाला बल ) से कम हो जाता है और वस्तु पानी से अधिक घनत्व होने के बाद भी पानी में नहीं डूबती है। 

     


  आपको क्या लगता है, अपनी बात कमेंट बॉक्स में लिखकर जरुर शेयर करें। धन्यवाद......


29 Jul 2019

सतत , वितत या मिश्रित भिन्न ( continues fraction ) by : Possibilityplus.in





   ऐसी भिन्न जो कई भिन्नों का समूह हो या कई भिन्ने  एक के बाद एक किसी एक भिन्न के हर से वृक्ष की शाखाओं के रूप में जुड़ी हों तो ऐसी भिन्न को मिश्रित, वितत या सतत भिन्न ( continues fraction ) कहते हैं। चलिए इसके बाारे में A to Z ( ए टू जे़ड ) जानकारियाँ लेते हैं।




     आर्टिकल के बारे में संक्षिप्त जानकारी 💡
          यह आर्टिकल गणितज्ञ और टेक्निकल लोगों के लिए बड़ा महत्वपूर्ण है क्योंकि मिश्रित भिन्न बहुव्यापी है।  इसका उपयोग हर क्षेत्र में किया जाता है। इसलिए इस  आर्टिकल को पुरी तरह से ध्यान  साथ पढ़िएगा।    



सतत भिन्नों का योग 🔖


सवाल 1.

का योग ज्ञात करें। 





हल : सबसे पहले 1 + 1/2 जोड़ना होगा। या यूँ कहें कि निचे जोड़ते हुए ऊपर की तरफ बढ़ते हैं।
इसलिए.             1 + 1/2 = ( 1×2 + 1 ) / 2
                                     = 3/2.

इस मान को रखने पर भिन्न हो जायेगी -
                       1 + 1 / ( 3/2 ) 
अब यहाँ से इसे दो तरिकों से हल कर सकते हैं -
पहला तरीका 
        इसमें    1 / ( 3/2 )  ,  2 का 1 के साथ गुणा होगा। 2 का गुणा 1 में इसलिए हो रहा है क्योंकि 3 में 2 की भाग है यानी 2, 1 का सहगुणनखंड  है।
तब भिन्न                2/3,    हो जायेगी।
अब भिन्न    1 + 2/3  हो जायेगी। 

इनको जोड़ने पर,      ( 1 × 3 + 2 ) / 3 = 5/3       - Ans.





दूसरा तरिका 




इस तरह से हल करते हैं। यहाँ पर दोनों विधियों के बारे में बताया गया जिससे आपको कोई संसय ना रहे। चलिए अब और बड़े सवालों को देखते हैंं।


सवाल 2. 

हल : सबसे पहले 3 + 1/4 को हल करना होगा। तब 
3 + 1/4  =  ( 3×4 + 1 ) / 4
              =  13 / 4. 

अब  2 + 1 / ( 13/4 ) का योग करना होगा। तब
2 + 1 / ( 13/4 ) = 2 + 4/13
                         = ( 2×13  +4 ) / 13
                         =  ( 26 + 4 ) / 13
                         = 30 / 13
 अतः Ans.        = 30 / 13.




सतत भिन्नों का घटना 🔶




सवाल 1. 



हल :  घटाने में भी निचे से ऊपर की तरफ हल करते जाते हैं।

बस फर्क इतना है कि इसमें घटाते हैं। 
 तब 3 - 1/0 को हल करने पर,
( 3×0 - 1 ) / 0 = - 1 / 0.

अब इस मान को भिन्न में रखेगें तब भिन्न
2 - 1 / ( - 1/0 ) = ( 2 - 1 × 0 ) / - 1
                        =  - 2

अब इस मान को भिन्न में रखेगें तब भिन्न
1 - 1 / - 2 =  ( 1×-2 - 1 ) / - 2
                =  ( - 2 - 1 ) / - 2
                =. - 3 / - 2
                = 3 / 2

उत्तर         = 3/2.



सतत भिन्नों का गुणा  


सवाल 1.  



हल :  यह सतत भिन्न का गुणा है। जब एक भिन्न में दूसरी भिन्न से भाग किया जाता है तब ऐसा होता है। इसमें जिस भिन्न से भाग करते हैं उसके हर का गुणा पहले वाली भिन्न के अंश में हो जाता है। 

 भिन्न का  अंश / हर    या  ( 1 × 1 ) /  2 × 1 = 1 / 2.

तथा   3 × 1 / 4 = 3 / 4
            
अब  ( 3 / 4 )  से 1 / 2 में भाग करनी होगी। 
तब.    ( 1 / 2 ) / ( 3 / 4 ) = 4 / 2 × 3
                               = 4 / 6.
उत्तर -              4 / 6



अगर 4 के स्थान पर हो तो हल क्या होगा ? 


सवाल 2.  


हल :   पहले वाले उदाहरण की भांति  हल करने पर, 
3 × 1 / 0  या ( 3 × 1 ) / 0 
              = 3 / 0.

इसके बाद  1 × 1 से 2 × 1  का मान निकालेंगे । तब

तब,           1 × 1 / 2 × 1  = 1 / 2.

अब ( 3 / 0 )  से ( 1 / 2 ) में भाग करना होगा। तब
 ( 1 / 2 ) / ( 3 / 0 ) =  0 / 6.

उत्तर -                0 / 6.







सतत भिन्नों की भाग   

28 Jul 2019

गिरते समय हमारे हाथ क्यों फैल जाते हैं और हमें सपने कैसे दिख जाते हैं आँखें बंद होते हुए भी ?

   
   क्या आप जानते हैं कि हमारी धड़कन, हमारी सांसें को कौन चलाता है ? हमें सपने आँखों के बंद होने के बावजूद भी कैसे दिख जाते हैं, यही नहीं हम सही गलत जो भी करते हैं इसके पीछे क्या राज है इन सभी के बारे विस्तार से जानेंगे।

इस आर्टिकल में हम ऐसी बातें जानेंगे जो हमारे जीवन जीने के तौर-तरीकों को ही नहीं बल्कि हमें अपनी असली स्वतंत्रता से जीने की सही मामले में आजादी मिल जायेगी। इसलिए इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़िएगा और अपने किमती राय भी दिजिए।


सबसे पहले इस सवाल को जानते हैं कि कैसे हमारे हाथ शरीर के गिरते समय अपने - आप फैल जाते हैं।




 हमारे दैनिक जीवन में अनेक ऐसी क्रियाएँ अथवा घटनाएँ हैं जिनके बारे में हम कहीं न कहीं पूरी तरह से नहीं जानते हैं। उन्हीं में से एक यह है कि जब हम गिरने वाले होते हैं तो हमारे हाथ फैल जाते हैं।ऐसा क्यों होता है यह सवाल अगर अपने आप से पूछो तो ज्यादातर लोगों को इसका ठीक - ठीक उत्तर नहीं मिल पाता है। चलिए अपने शरीर के गुण के बारे में जानते हैं।










 गिरते समय हमारे हाथ क्यों फैल जाते हैं ?

       हमारे हाथ का फैलना ( गिरते समय ) हमारे शरीर के एक विशेष गुण का होना है। दरअसल हमारे शरीर में मुख्यरुप से दो दिमाग / मस्तिष्क माने जाते हैं  - 
  1. दिल / मन ( अचेत मन या अवचेतन मन ) 
  2. दिमाग / मस्तिष्क ( चेतन या सचेत मन ) 


      इसमें दिल / मन, दिमाग से अत्यंत तेज होता है ( गति में )। इसके लिए बहुत सी क्रियाएँ 1 सेकेंड से भी कम समय में पुरी ही नहींं होती बल्कि काफी भी होती है। दरअसल हमारा मन यह कभी भी नहीं चाहता है कि हम किसी तरह की तकलीफ सहें क्योंकि इसे वह अहसास पता है जो इसे अच्छे नहीं लगते हैं। यह हमेशा अच्छा अहसास कि इच्छा रखता है और यह इसी अच्छे अहसास को पाने के लिए हमेशा काम करता रहता है।


 इसलिए जब हमारा शरीर अचानक में गिरनेे वाला होता है तो हमारा यह मन वह पोजीशन प्रदान करता है जिससे हमारे शरीर को कोई हानि ना पहुुंचे। यही कारण है कि हमारे हाथ शरीर के गिरने से पहले ही फैल जाते हैं।
         क्या हम ऐसे समय में यह सोच सकते हैं कि हमें क्या करना है और क्या नहीं। दरअसल हमारे दिमाग को किसी भी वस्तु या क्रिया को समझने में कम से कम 1 सेकेंड तो लगेगा पर तबतक तो हम धरती पर गिर चुके होगेें। 

   चलिए अब जानते हैं वैज्ञानिक दृष्टि से कि अचानक गिरते समय हमारे हाथ फैलने के क्या होता है।  
दरअसल जब हमारा शरीर अचानक गिरता है तो इसकी गति एकाएक तेजी से बढ़ने लगती है जिसके विरोध में हमारा हाथ फैल जाता है और गिरने की गति थोड़ी सी कम हो जाती है अथवा यह शरीर की सबसे संतुलित स्थिति होती है उस समय। 
       उपर्युक्त बातें यह भी स्पष्ट करती हैं कि मन को अचेत या अवचेतन मन कहना तर्कसंगत नहीं होगा क्योंकि यह तो हमेशा सक्रिय ( active ) रहता है और तभी तो इसे हर छोटी - बड़ी क्रियाओं का ज्ञान  पहले ही हो जाता है। भले ही यह तर्क नहीं करता, पर हमेेशा जागृत रहता है और जागृत रहना भी सचेत होने की पुष्टि करता है।









मन ( Unconscious mind ) की विशेषताएँ 

मन की विशेषताएँ इस प्रकार हैं - 
  • मन ना तो सोचता है और ना ही समझता है। 
  • मन अहसास, महसूस अथवा भावनाओं के आधार पर चलता है। 
  • इसकी गति प्रकाश की गति से भी तेज होता है। 
  • इसमें अलौकिक शक्तियों को पढ़ने की क्षमता होती है। 
  • मन या अवचेतन मन से ही हमारे शरीर की क्रियाओं का सम्पादन होता है। 
  • हमारे शरीर में जैसा अहसास होगा वैसी ही ऊर्जा हमारे अन्दर होगी। 
  • मन की मदत से आदमी भगवान के तुल्य हो सकता है। 
  • पूजा - पाठ भी मन से सफल होती है, मस्तिष्क से नहीं। 





 मन की विशेषता और कमियों का स्पष्टीकरण 📣


    मन की विशेषताएँ इतनी है कि इसके लिए एक किताब भी कम पड़ जायेगी। मन की विशेषताओं के अलावा कुछ कमियां हैं जो मुश्किलें पैदा करती हैं। चुँकि हमने ऊपर पढ़ा है कि मन कुछ सोचता नहीं है कि क्या गलत है और क्या सही है। इसे अगर गलत काम भी अच्छा लगे तो वह उसी को करना चाहेगा बिल्कुल बच्चे की तरह जिन्हें गलत - सही का कोई पर्क नहीं होता। और दिमाग / मस्तिष्क बच्चों के अभिभावकों का काम करता है जो मन को गलत - सही का फर्क बताता है। हमारा मस्तिष्क हमारे मन को जब उसकी खामियों के  ( जो वह करना चाहता है ) बारे में बताता है और यह अहसास दिलाता है कि इससे तुम्हें बुरा अहसास मिलेगा और अगर तुम्हें सही में अच्छा अहसास पाना है तो यह करो। जो दिलाशा हम मन को देते हैं वह उससे भी अधिक अच्छा लगना चाहिए जो पहले वह करना चाहता था। ऐसा होने पर मन - मस्तिष्क के साथ हो लेता है जिसे साधरण भाषा में बात मानना कहते हैं । यह वही स्थिति है जब हमे कोई मतभेद नहीं होता है और तभी तो हमारे सर में कोई तनाव नहीं होता है। हमारे सर में तनाव ज्यादा तब होता है जब मन और मस्तिष्क के मतो में अन्तर होता है यानी मन कुछ और मस्तिष्क कुछ कहता है। कभी-कभी हमें बहुत सी बातें बिना सोचे समझे मिल जाती हैंं पर हम जबतक वैज्ञानिक आधार पर नहीं समझ पाते हैं तबतक हम उसे जानते हुए भी विश्वास नहीं करते / कर पाते।









हमें स्वप्न / सपने कैसे दिखते हैं जबकि हमारी आँखें बंद होती हैं। 


   बहुत से लोग यह सोचते होगें कि बिना आँखों को खोले कुछ देखा नहीं जा सकता है पर सपने हमें कैसे दिख जाते हैं जबकि हमारी आँखें तो बंद रहती हैं। इसको जानने और समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि सपने किन  - किन कारणों से दिखते हैं। यह मुख्यतः दो कारणों से दिखते हैं -

  1. सोंच के कारण सपने दिखना। 
  2. बिना सोचे सपने दिखाई देना। 




स्पष्टीकरण :  सबसे पहले यह जान लेते हैं कि हमें कोई भी वस्तु कैसे दिखाई देती है। जब हम किसी भी वस्तु को देखते हैं तो उस वस्तु का प्रतिबिम्ब हमारे रेटिना के फोकस पर बनता है। इस तरह हमेें वह वस्तु दिखाई देने लगती है। इसी तरह से जब हम किसी व्यक्ति या वस्तु की कल्पना गहराई से करते हैं तो उस व्यक्ति या वस्तु का प्रतिबिम्ब हमाारी रेटिना पर पर बनने लगता है और सपने में भी यह दिखाई दे सकता है । जैसे हमें यह अहसास होता है कि हमें वह वस्तु वास्तव में दिखाई दे रही हो। पर यह तभी possible है जब हम उस व्यक्ति या वस्तु को पहले से ही देखा हो।
    अब बात करते हैं कि वह व्यक्ति या वस्तु हमें सपनों में कैसे दिखाई देता है जिसके बारे में हमने ना कभी सोचा और ना ही कभी भी देखा हो। इस तरह के सपने दैवीय हो सकते हैं। हम जानते हैं कि जिस तरह से कोई फोटो, विडियो आदि चिजे एक मोबाईल से दूसरे मोबाईल तक ऊर्जा के रूप में स्थानांतरित होते ( आते - जाते ) हैं। बिल्कुल इसी तरह से हमारी आत्मा से शरीर तक सभी दृश्य ऊर्जा के रुप में आते हैं।  ऐसा तब होता है जब शरीर के आसपास ऐसी ऊर्जाओं का आना - जाना होता है। यह ऊर्जा हमारे शरीर से कभी-कभी अपने आप कनेक्ट हो जाती है और कभी-कभी कनेक्ट कराई जाती है। जो दैवीय शक्तियों द्वारा भी हो सकती है। यह पुरी तरह से कहना वैज्ञानिकों के लिए भी मुमकिन नहीं है क्योंकि यह वैज्ञानिक दृष्टि से सिध्द नहीं हुआ है।





आपकी क्या राय है जरूर बताएँ हमें बहुत खुशी होगी। धन्यवाद...



27 Jul 2019

आसमानी बिजली ⛈ से कैसे बचे ?


              बरसात के मौसम में आकाशीय बिजली ( वैद्युत ) मनुष्य के लिए किसी मुुसीबत से कम नहीं है। क्योंकि  हर साल ( वर्ष ) में बहुतों की जान चली जाती है। बिजली जब कड़कती है तो हर व्यक्ति डरने लगता है क्योंकि सभी को यह पता है कि यह जिस पर गिरि उसकी मौत लगभग तय  है।


     अब सवाल है कि इस मौतरुपी बिजली के कहर से कैसे बचा जाये।
 इस आर्टिकल को अंत तक पढ़ने पर हमें वो जानकारियाँ मिलेगी जो हमें आकाशीय बिजली से बचने में बहुत हद तक मदत करेगी।



    आकाशीय बिजली से बचने के उपाय 




 जब आकाशीय बिजली लगातार तड़के तो हमें 
आकाशीय बिजली ⛈ से बचने के निम्नलिखित उपाय करने चाहिए :  - 

  • छोटे और घने पेड़ के नीचे ही खड़े हों ( यदि खड़ा होना पड़े तो ) 
  • अगर संभव हो तो किसी भवन ( घर ) में चले जायें।
  • प्लास्टिक हैंड वाली छतरी ☔ का उपयोग करें।
  • मोबाइल फोनस् को Flight mood पर करें या Switch off कर दें ।
  • टेलीविजन का इस्तेमाल भी ना करें। 
  • अपने घर के ऊपर किसी छड़ को अवश्य लगायें। 
  • अगर आप किसी वाहन में हैं तो वाहन से ना निकलें। 
  • छत पर या खुले मैदान में ना रहें। 
  • बिजली, टेलीफोन के खंभों से दूर रहें। 
  • अगर त्वचा में झुनझुनी हो तो तुरन्त निचे बैठकर  कानों पर अपने हाथ रख दें। 
  • अपने हाथ में कोई धातु ( जो विद्युत चालक हों ) को अपने से दूर करदें। 
  • खेत में फावड़ा न चलायें। 











आकाशीय बिजली क्यों गिरती है ? 

      जिस प्रकार पानी जिस तरफ ढाल पाता है उधर से जाने लगता है। यहां पर समझने वाली बात यह है कि पानी को एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए ढाल अथवा झुकाव जरूरी होता है ठीक उसी तरह बिजली के आवागमन ( आने - जाने )  के लिए विभव में अन्तर ( या विभवान्तर ) जरुरी होता है। बिजली उसी वस्तु पर गिरती है जिसका विभव इसके विभव से कम हो वैसे आकाशीय बिजली का विभव हजारों में होता है। इसलिए यह बिजली खम्भों के तारों पर भी गिर जाती है। सबसे ज्यादा बिजली उस मार्ग से होकर जाती है जिधर इसे सबसे ज्यादा विभवान्तर मिले। बिजली का उस वस्तु पर गिरने की possibility ज्यादा होती है जो अधिक से अधिक नुकिला हो। जैसे : लम्बे और पतले पेड़, खम्भे, आदि। क्या आप यह सोच रहे हैं कि बड़े - बड़े महानगरों में बड़ी - बड़ी बिल्डिंग या टावर होते हैं पर उन पर तो नहीं गिरती आखिर  क्यों ? 

 दरअसल बिल्डिंग और टावरों के सबसे ऊपरी भाग पर नुकिलानुमा धातु की छड़ होती है जो आकाशीय बिजली को उसी के प्रेरण से प्लस चार्ज के द्वारा निश्क्रिय कर देती है। इसके अलावा एक रास्ता और है अगर घर, बिल्डिंग तथा टावर के ऊपर चारो ओर एक धातु तार को धरती से संबंधित कर दें तो इसपर आकाशीय बिजली गिरते ही पृथ्वी में चली जायेगी। 

   एक सवाल अब भी उठ रहा है कि जब पेड़ - पौधों पर बिजली जब गिरती है तो इसमें आग 🔥 क्यों लग जाती है। इसका जवाब है जोड़ पर ढीला होना।






जिस तरह तार ढीला होने पर उसी जगह आग 🔥 लगती है जहां पर यह तार ढीला हो। 
ठीक इसी तरह आकाशीय बिजली जिस वस्तु पर गिरती वहां पर इसका जोड़ ढीला होता है और इसी कारण से वहाँ आग लग जाती है। 



इस पोस्ट के बारे में आपकी क्या राय है हमें जरूर बताएँ। धन्यवाद.. 

18 Jul 2019

हनुमानजी को उनकी परछाईं से कैसे पकड़ा रक्षशी सिंघिका ने ?



       यह पोस्ट बहुत ही तार्किकता पर आधारित है। यह भगवान हनुमान जी या बजरंगबली की एक घटना है। इस पोस्ट में हम जो भी पढ़ेंगे वो तार्किक और विज्ञान की दृष्टि से होगा।



   हममें से अधिकांश लोगों के मन में यह सवाल उठा होगा कि सिंघिका राक्षशी ने आखिर परछाईं की मदत से महाबली बजरंगबली को पकड़ लेती है। कैसे.. कैसे.. कैसे..
तो दिल थाम कर बैठ जाईए और पूरी जानकारी जरुर पढ़िएगा। तो चलिए देर मत करिए, शुरू करते हैं।







नोट : इस पोस्ट को अंत तक जरूर पढ़िएगा क्योंकि मुख्य उदाहरण और व्याख्या अंत में ही है।

   


       सिंघिका राक्षशी ने हनुमान जी की परछाईं को कैसे पकड़ा ?

       सिंघिका राक्षशी ने हनुमान जी की परछाईं को कैसे पकड़ी होगी ? 
    दरअसल उसके पास ऐसी शक्ति या वरदान था जिससे यदि वह किसी भी वस्तु की परछाईयों को पकड़ ले तो वह वस्तु भी उसकी पकड़ में आ जायेगी। अब आप शायद यह सोच रहे होंगे कि यह तो सभी लोग जानते हैं कि किसी शक्ति के द्वारा ही वह किसी भी वस्तु परछाईं को पकड़ने में सक्षम थी। पर हम वैज्ञानिक तरीके से उसे समझना चाहते है। चूंकि हमारे पास परछाईं के अलावा कोई और चारा नहीं है जिस पर हम अपनी सोंच - विचार करें। इसलिए परछाईं को पुरी तरह से समझते हैं। 






 परछाईं कैसे बनती है ? 

       हम जानते हैं कि सामान्यतः परछाईं काली   ही होती है। अब हमें यह जानकारी जानना बहुुत जरूरी है कि यह काली क्यों होती है ? ❍






     परछाईं के काले होने का कारण

परछाईं के काली होने का कारण जानने से पहले यह जान लें यह कैसे बनती है।
परछाईं का बनना - जब किसी वस्तु पर कोई प्रकाश की किरणें पड़ती है तो वस्तु के जितने भाग  पर प्रकाश पड़ता है तो वह भाग ऊर्जा के कारण चमकने लगता है। वस्तु के इसी भाग के ठीक उल्टी तरफ प्रकाश की किरणें नहीं पहुंच पाती हैं और इसी कारणवश वस्तु का यह भाग ऊर्जा से वंचित रह जाता है। इसी कारण से जितने भाग पर प्रकाश नहीं पड़ता है ठीक उतने भाग की छाया बन जाती है।
चूूंकि काला रंग नकारात्मक उर्जा / ऊर्जाहीनता का प्रतीक है। इसलिए परछाईं काली होती है। 







  अंधेरे या रात में ऊर्जा में कमी का होना 

        क्या आप जानते हैं अंधेरे या रात के अंधेरे में हमें ज्यादा डर  क्यों लगता है ? 
रात में प्रकाशीय ऊर्जा नहीं होती है चूंकि अंधेरा हमारे शरीर की ऊर्जा को निरंतर खिंचता रहता है जिससे हमारे शरीर की ऊर्जा इतनी कम हो जाती है कि हमें छोटी-छोटी बातों पर भी डर का अहसास होने लगता है। एक बात और जानना चाहोगे कि रात के अंधेरे में हमें नींद जल्द से जल्द क्यों आ जाती है तो इसका भी कारण अंधेरा ही है। 
  दरअसल जब हम अंधेरे के संपर्क में आते हैं तो हमारी आँखों को ऊर्जा की कमी होने लगती है जिससे हमारी आंँखें अपनेआप बंद होने लगती है। इस तरह से नींद जल्द से जल्द आ जाती है। वैसे अगर हम अपनी आँखों को बंद करके रखें तो भी नींद आने लगती है। कारण यह है कि जब हमारी आँखें बंद होती है तो भी कुछ दिखाई नहीं देता सिर्फ अंधेरे के अलावा। तो कुल मिलाकर कहें कि अंधेरा किसी भी तरह से आंखों को मिलना चाहिए बस और कुछ नहीं। 


अंधेरे के गुणों को देखिए :

  • अंधेरा लगभग सभी वस्तुओं की ऊर्जा को अपनी तरफ खींचता है। 
  • अंधेरे की तिव्रता जितनी अधिक होगी वह ऊर्जा को उतनी तीव्रता से खींचेगा। 




नोट : यह उपर्युक्त गुण प्रकाश के गुणों को  ऊल्टा करनेे पर मिला है। जब किसी वस्तु पर प्रकाश डाला जाता है तो उस वस्तु पर प्रकाशीय दबाव जरुर पड़ता है। दरअसल प्रकाशीय ऊर्जा, ऊर्जा के बंडलो के रूप में चलती है। अतः स्पष्ट है कि प्रकाश जिस भी वस्तु पर पड़ेगा उस वस्तु पर  दबाव तो लाज़़मी है। दबाव का ऊल्टा खिंचाव होता है। इसलिए अंधेरे का प्रभाव बल खिंचाव वाला होता है।




   व्याख्या :  अगर हमारा अंदाजा सही है तो इसके अनुसार राक्षशी  सिंघिका ने अपनी शक्ति से हनुमान जी की परछाईं को इतना काली कर दिया कि परछाईं का खिंचाव बल हनुमान जी के गतिकी बल से अधिक हो गया हो या परछाई को माध्यम बनाकर उनका पूरा परिणामी बल शून्य कर दिया हो । बिल्कुल ब्लैैक होल की तरह। जैसे ब्लैैक होल के पास आने वाली कोई भी वस्तु पूरी तरह से बिखर जाती है। ब्लैैक होल का खिंचाव बल इतना अधिक है कि इसमें से कोई प्रकाश भी गुजरकर नहीं जा सकता है। 
    आइए कुछ तर्क और उदाहरण देखते हैं जिससे इस व्याख्या को समझने में और मदत मिले। 

तर्क 
  • सिंघिका राक्षसी सिर्फ परछाई की मदद से ही किसी को पकड़ सकती थी। 
  •  कोई भी परछाईं वस्तु के इशारे से 100% तक नहीं चल सकती हैं। 
  • परछाईं भी वस्तु को नियंत्रित कर सकती है। इसके लिए परछाई में वस्तु की गतिकी बल से अधिक ऊर्जा होनी चाहिए। 
  • परछाई एक ऋणात्मक ऊर्जा है जो किसी भी वस्तु को अपनी ओर आकर्षित कर सकती है। 



 हम जाानते हैं कि परछाई वस्तु से उत्पन्न होती है। इससे एक बात यह साफ हो रही है कि वस्तु और परछाई में कुछ न कुछ सम्बन्ध होना तय है।
    हम सब यह बात तो जानते ही हैं कि जो भी राशियाँ एक दूसरे से संबंधित होती हैं तो उनमें से किसी को भी अगर परिवर्तित करें तो दूसरी राशि पर इसका असर या प्रभाव अवश्य ही पड़ेगा। 





उदाहरण 1.    जिस पंखे से हम हवा लेते हैं ( जैसे टेबल फैन ) अब इसका उदाहरण देखिए।



पंखे के चलने से हवा बहनें लगती हैं। इसका मतलब पंखे और हवा में एक संबंध जरूर जो इन्हें जोड़ता है । यहां पर ध्यान देने वाली बात यह है कि सिर्फ पंखा ही हवा को चला नहीं सकता है बल्कि हवाा भी पंखे को अपने ईशारे पर नचा सकती है पर शर्त यह है कि हवा का गतिकी बल पंखेे से अधिक होना चाहिए। क्या आपने हवा से चलते हुए पंखे नहीं देखेें है। शायद सभी ने देखें होगें। कुछ इसी तरह से परछाई भी वस्तु को अपनी ऊर्जा की मदत  से अपनी तरफ खिंचती है ना कि केवल वस्तु ही परछााईं को अपनी तरफ खिंंचती है। 




  उदाहरण 2.
                   जैसे : y = 2x समीकरण में x और y  दोनों एक-दूसरे पर निर्भर कर रहे हैं। अगर हम y में से 1 घटा दें तो 2x से भी 1 घटना पड़ेगा। 



   



  नोट :     इस तरह से हमने कुछ तर्क और उदाहरणों को देखा जो पूरी तरह से यह तो सिद्ध नहीं करता है कि वास्तव में यही कारण है जिससे हनुमानजी को राक्षसी सिंघिका परछाई की मदद से पकड़ा था लेकिन लगभग पुष्टि जरुर कर रहा  है। 

    आपको यह जानकारी कितना हद तक सही लगी। अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर भेजे। आप हमें dkc4455@gmail.com पर मेल कर सकते हैं। धन्यवाद. .... 


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